पितृत्व अवकाश को कानूनी अधिकार बनाने की मांग में तेजी
पितृत्व अवकाश की आवश्यकता
भारत में पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) को कानूनी मान्यता देने की मांग जोर पकड़ रही है। आम आदमी पार्टी के नेता और राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा ने संसद में इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी केवल माताओं पर डालना एक गंभीर सामाजिक और कानूनी कमी है।
उन्होंने कहा कि जब एक बच्चे का जन्म होता है, तो बधाई माता-पिता दोनों को मिलती है, लेकिन देखभाल की जिम्मेदारी पूरी तरह से मां पर डाल दी जाती है। इसे उन्होंने ‘समाज की विफलता’ करार दिया। चड्ढा ने बताया कि हमारे सिस्टम में केवल मातृत्व अवकाश को मान्यता दी जाती है, जबकि पिता की भूमिका को नजरअंदाज किया जाता है।
राज्यसभा में उन्होंने यह मांग की कि पितृत्व अवकाश को कानूनी अधिकार बनाना चाहिए, ताकि पिता को अपने नवजात बच्चे और पत्नी की देखभाल के लिए नौकरी और परिवार के बीच चुनाव नहीं करना पड़े। चड्ढा ने कहा कि एक मां को गर्भावस्था के नौ महीनों के बाद, सामान्य या सिजेरियन डिलीवरी जैसी कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। ऐसे समय में उसे दवाइयों के साथ-साथ अपने पति के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सहयोग की बेहद आवश्यकता होती है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पति की जिम्मेदारी केवल बच्चे तक सीमित नहीं होती, बल्कि पत्नी की देखभाल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस समय पति की मौजूदगी कोई लग्जरी नहीं, बल्कि एक आवश्यकता है।
चड्ढा ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्तमान में केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 15 दिन का पितृत्व अवकाश मिलता है, जबकि निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के पास यह अधिकार नहीं है। भारत की लगभग 90 प्रतिशत कार्यबल प्राइवेट सेक्टर में काम करती है, जिसका मतलब है कि अधिकांश पिता इस सुविधा से वंचित हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि स्वीडन, आइसलैंड और जापान जैसे देशों में पितृत्व अवकाश 90 दिनों से लेकर 52 हफ्तों तक कानूनी रूप से सुनिश्चित किया गया है।
चड्ढा ने सरकार से अपील की कि कानून को समाज का आईना होना चाहिए और इसमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि बच्चे की देखभाल केवल मां की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि माता और पिता दोनों की साझा जिम्मेदारी है।
