पुरी के जगन्नाथ मंदिर में रत्न भंडार की गणना की प्रक्रिया शुरू
रत्न भंडार की गणना का ऐतिहासिक दिन
नई दिल्ली: ओडिशा के पुरी में स्थित 12वीं सदी के विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर के इतिहास में बुधवार का दिन एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बन गया। लगभग 50 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद, मंदिर के 'रत्न भंडार' में रखे अनमोल आभूषणों और रत्नों की आधिकारिक गणना और सूची बनाने की प्रक्रिया आखिरकार आरंभ हो गई है। इस संवेदनशील कार्य के लिए मंदिर प्रशासन ने राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित एक विशेष मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की है, जिससे पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।
आध्यात्मिक और पारंपरिक मर्यादाओं के बीच गणना
रत्न भंडार खोलने की यह प्रक्रिया पूरी तरह से आध्यात्मिक और पारंपरिक मर्यादाओं के बीच शुरू हुई। मंदिर के अधिकारियों और विशेषज्ञों की टीम ने निर्धारित शुभ मुहूर्त के अनुसार दोपहर 12:09 बजे से कार्य प्रारंभ किया। सभी सदस्यों ने मंदिर की परंपरा का पालन करते हुए पारंपरिक धोती और गमछा धारण किया। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया के दौरान मंदिर में भगवान की दैनिक पूजा और अन्य अनुष्ठान बिना किसी बाधा के जारी रहेंगे।
विशेषज्ञों की टीम और आधुनिक तकनीक का उपयोग
इस बार की गणना केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आधुनिक तकनीक का भरपूर सहयोग लिया जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के प्रतिनिधियों और सरकारी बैंक के अधिकारियों के साथ दो वरिष्ठ रत्न विशेषज्ञ (जेमोलॉजिस्ट) भी टीम का हिस्सा हैं। हर एक आभूषण की बारीकी से पहचान की जा रही है और सुरक्षा तथा रिकॉर्ड के लिए उनकी डिजिटल फोटोग्राफी भी कराई जा रही है। इससे 1978 की तुलना में इस बार काम अधिक सटीकता और तेजी से होने की उम्मीद है।
आभूषणों के संरक्षण के लिए विशेष व्यवस्था
आभूषणों को सुरक्षित रखने के लिए रंगों के आधार पर कोडिंग की गई है। स्वर्ण आभूषणों को पीले कपड़े, चांदी के सामान को सफेद और अन्य बहुमूल्य रत्नों को लाल कपड़े में लपेटकर रखा जा रहा है। इन सामग्रियों को संरक्षित करने के लिए विशेष रूप से छह बड़े संदूक तैयार किए गए हैं। पहले बाहरी कक्ष के आभूषणों की गणना की जा रही है और उसके बाद आंतरिक कक्ष को खोला जाएगा। प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए एसओपी का कड़ाई से पालन किया जा रहा है।
श्रद्धालुओं के लिए नए दर्शन नियम
रत्न भंडार की सुरक्षा और कार्य की गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए मंदिर के भीतर श्रद्धालुओं के प्रवेश पर कुछ कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। भक्तों को 'भीतर कथा' तक जाने की अनुमति नहीं है। उन्हें केवल 'बाहर कथा' से ही भगवान के दर्शन करने का अवसर मिल रहा है। प्रशासन ने यह सुनिश्चित किया है कि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की बड़ी असुविधा न हो। मंदिर परिसर में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं ताकि पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हो।
1978 का ऐतिहासिक रिकॉर्ड
आखिरी बार साल 1978 में जब गणना हुई थी, तब 72 दिनों तक चली प्रक्रिया में लगभग 128 किलो सोना और 221 किलो चांदी का विवरण दर्ज किया गया था। उस समय कुल 454 स्वर्ण और 293 चांदी के आभूषण मिले थे। इस बार आधुनिक मशीनों और बेहतर प्रबंधन के कारण उम्मीद जताई जा रही है कि यह कार्य काफी कम समय में पूरा हो जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया मंदिर की अकूत संपत्ति के सही मूल्यांकन और भविष्य के लिए उनके संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है।
