पूर्व अमेरिकी सुरक्षा सलाहकार ने पाकिस्तान की ईरान वार्ता में भूमिका पर उठाए सवाल
पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल
वाशिंगटन: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एचआर मैकमास्टर ने ईरान से संबंधित कूटनीतिक प्रयासों में पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पाकिस्तान को चीन का “क्लाइंट” करार देते हुए उसकी मध्यस्थता पर संदेह व्यक्त किया। मैकमास्टर का मानना है कि पाकिस्तान को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का करीबी सहयोगी माना जाना चाहिए, जिससे ईरान-अमेरिका वार्ता में उसकी भूमिका निष्पक्ष नहीं हो सकती।
यह टिप्पणी उस समय आई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस्लामाबाद में प्रस्तावित अमेरिका-ईरान वार्ता के दूसरे दौर को रद्द कर दिया। मैकमास्टर ने चीन की भूमिका पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि बीजिंग की रुचि ईरान में मौजूदा शासन को बनाए रखने में है। उन्होंने कहा, “चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ईरान में इस्लामिक रिपब्लिक को सत्ता में बनाए रखने के लिए बेताब है।” उनके अनुसार, चीन का यह रुख क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और आर्थिक हितों से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पाकिस्तान की ओर से मध्यस्थता की पेशकश पूरी तरह से निष्पक्ष नहीं हो सकती। मैकमास्टर ने कहा, “इन वार्ताओं में मध्यस्थ बनने की पेशकश के पीछे कोई न कोई छिपा हुआ उद्देश्य हो सकता है।”
पाकिस्तान की सुरक्षा नीति पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने अपने अनुभव को “निराशाजनक” बताया। उनके अनुसार, पाकिस्तान अक्सर दोहरी नीति अपनाता है—एक तरफ वह आतंकवाद विरोधी सहयोग की बात करता है, वहीं दूसरी ओर वह विरोधी तत्वों को समर्थन देता है।
मैकमास्टर ने कहा कि भारत द्वारा लंबे समय से उठाए जा रहे ये मुद्दे नए नहीं हैं। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान 1940 के दशक के अंत से ही आतंकवादी संगठनों को अपनी विदेश नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल करता रहा है।”
उन्होंने चीन-ईरान संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि बीजिंग की आर्थिक मदद तेहरान के लिए महत्वपूर्ण है। “चीन ईरान के तेल का लगभग 90 प्रतिशत खरीदता है, जिससे वहां की सरकार को वित्तीय सहारा मिलता है,” उन्होंने कहा। उनके अनुसार, इससे ईरान अपनी क्षेत्रीय गतिविधियों को जारी रखने में सक्षम रहता है। मैकमास्टर ने निष्कर्ष में कहा कि इन सभी कारकों को देखते हुए पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका को चीन की व्यापक रणनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
