बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में सभी आरोपी बरी
महत्वपूर्ण निर्णय
मुंबई: गुजरात के चर्चित सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने विशेष अदालत द्वारा 21 पुलिसकर्मियों सहित सभी 22 आरोपियों को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है। दिसंबर 2018 में सीबीआई की विशेष अदालत ने इन सभी को दोषमुक्त करार दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए सोहराबुद्दीन के दो भाइयों ने अप्रैल 2019 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अब, वर्षों बाद, उच्च न्यायालय ने आरोपियों को बड़ी राहत दी है। बरी हुए पुलिसकर्मियों में गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के जवान और अधिकारी शामिल हैं।
राजनीतिक संवेदनशीलता
राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामला
यह एनकाउंटर मामला 2005-06 का है और भारत के सबसे विवादास्पद मामलों में से एक रहा है। यह घटना उस समय हुई जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, जिससे विपक्ष ने राज्य सरकार को घेरने की कोशिश की थी और देश की राजनीति में हलचल मच गई थी। शुरुआत में इस मामले की जांच गुजरात सीआईडी (क्राइम) और एटीएस ने की थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में जांच सीबीआई को सौंप दी और निष्पक्ष सुनवाई के लिए ट्रायल को गुजरात से हटाकर मुंबई की विशेष अदालत में स्थानांतरित कर दिया था।
सोहराबुद्दीन का परिचय
सोहराबुद्दीन कौन था और सीबीआई की थ्योरी क्या थी?
2018 में ट्रायल कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि सोहराबुद्दीन एक वांछित और खतरनाक अपराधी था, जिसके खिलाफ गुजरात और राजस्थान में हत्या, अपहरण और फिरौती जैसे कई गंभीर मामले दर्ज थे। सीबीआई के अनुसार, 23 नवंबर 2005 को सोहराबुद्दीन, उसकी पत्नी कौसर बी और उसके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति को हैदराबाद से सांगली जाते समय एक लग्जरी बस से अगवा किया गया था। जांच एजेंसी का दावा था कि सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी को पहले गुजरात के एक फार्महाउस में बंधक बनाया गया और फिर नवंबर 2005 में अहमदाबाद में उनका फर्जी एनकाउंटर कर दिया गया। इसके तुरंत बाद उसकी पत्नी की भी हत्या कर दी गई, जबकि तुलसीराम प्रजापति का एनकाउंटर लगभग एक साल बाद हुआ।
पुलिस का दावा
पुलिस का दावा- बड़े नेता की हत्या की थी साजिश
सीबीआई की कहानी के विपरीत, आरोपी पुलिसकर्मियों का यह कहना है कि सोहराबुद्दीन का आतंकवादी संगठनों से गहरा संबंध था। पुलिस के अनुसार, वह किसी बड़े राजनेता की हत्या करने के इरादे से अहमदाबाद आया था। इस मामले में यह भी दावा किया गया था कि पुलिस ने सोहराबुद्दीन के करीबी तुलसीराम प्रजापति की मदद से उसे ट्रेस किया और इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। कहा जाता है कि प्रजापति को यह भरोसा दिया गया था कि भारी राजनीतिक दबाव के कारण सोहराबुद्दीन को केवल गिरफ्तार किया जा रहा है और उसे जल्द ही जमानत पर छोड़ दिया जाएगा।
