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ब्रिक्स+: श्रमिक वर्ग के लिए एक नई उम्मीद

ब्रिक्स+ समूह का महत्व श्रमिक वर्ग के लिए अत्यधिक है, क्योंकि यह मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देता है। भारत सरकार को इस शिखर सम्मेलन को प्राथमिकता देनी चाहिए। इस लेख में ब्रिक्स+ की भूमिका, भारत का अवसर, और श्रमिक अधिकारों के इतिहास पर चर्चा की गई है। जानें कि कैसे ब्रिक्स+ एक नई विश्व व्यवस्था की दिशा में कदम बढ़ा रहा है और श्रमिक वर्ग के अधिकारों को पुनर्स्थापित करने में मदद कर सकता है।
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ब्रिक्स+: श्रमिक वर्ग के लिए एक नई उम्मीद

ब्रिक्स+ का महत्व

ब्रिक्स+ एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, जिसे श्रमिक वर्ग को समझना आवश्यक है। भारत सरकार को इस पहल के महत्व को पहचानते हुए इसे प्राथमिकता देनी चाहिए। ब्रिक्स+ ने वर्तमान वैश्विक व्यवस्था के साम्राज्यवादी ढांचे को चुनौती दी है।


भारत का अवसर

नए वर्ष में भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर ब्रिक्स+ समूह के शिखर सम्मेलन की मेज़बानी है। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत सरकार इसे कितनी गंभीरता से लेगी। आमतौर पर, भारत का शासक वर्ग, विशेषकर मौजूदा केंद्र सरकार, अमेरिका की ओर झुकाव रखता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर पश्चिमी नेताओं के साथ उच्चस्तरीय बैठकों में भाग लेते हैं।


अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की भूमिका

2023 में भारत को जी-20 और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) दोनों की अध्यक्षता मिली। जहां जी-20 शिखर सम्मेलन को धूमधाम से आयोजित किया गया, वहीं एससीओ का आयोजन ऑनलाइन किया गया। ब्रिक्स+ शिखर सम्मेलन के महत्व को लेकर चिंताएं हैं, खासकर जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे निशाना बनाया है।


ब्रिक्स+ की संभावनाएं

ब्रिक्स+ ने बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था की उम्मीद जगाई है, जो नव-उदारवाद के खिलाफ विमर्श को बढ़ावा देती है। श्रमिक अधिकारों के ऐतिहासिक अनुभव से यह स्पष्ट है कि जब तक नव-उदारवाद की व्यवस्था समाप्त नहीं होती, तब तक मेहनतकश वर्ग अपने अधिकारों को पुनः प्राप्त नहीं कर सकेगा।


वैश्विक पूंजीवाद की चुनौतियां

ब्रिक्स+ में शामिल अधिकांश देशों में शासन उन राजनीतिक शक्तियों के हाथ में है, जो अंतरराष्ट्रीय पूंजी से जुड़े हैं। वैश्विक पूंजीवाद के वर्तमान चरण में, पश्चिमी देशों के शासक वर्गों के हितों में सीमित अंतर्विरोध उत्पन्न हुए हैं।


नई विश्व व्यवस्था की दिशा में कदम

ब्रिक्स+ ने मौजूदा विश्व आर्थिक ढांचे का विकल्प तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। यह एक नई विश्व व्यवस्था की ओर ले जाने का प्रयास है। यदि यह सफल होता है, तो यह अर्थव्यवस्था में उत्पादक क्षमता और संप्रभ विकास को पुनर्स्थापित कर सकता है।


ब्रिक्स का इतिहास

ब्रिक्स की स्थापना ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के सहयोग से हुई। इस समूह ने वैश्विक आर्थिक ढांचे में परिवर्तन की मांग की है। 2015 में न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना की गई, जिसे विश्व बैंक के विकल्प के रूप में देखा जाता है।


यूक्रेन युद्ध का प्रभाव

फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद, ब्रिक्स देशों ने वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया। डॉलर के वर्चस्व को खत्म करने की चर्चा ने जोर पकड़ा है। ब्रिक्स+ का विस्तार हुआ है और इसे अब ब्रिक्स-11 के नाम से जाना जाता है।


श्रमिक वर्ग के अधिकार

श्रमिक वर्ग के अधिकारों की अवधारणा समाजवाद की विचारधारा से जुड़ी है। औद्योगिक क्रांति के दौरान श्रमिकों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ा। 20वीं सदी में ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता मिली।


नव-उदारवाद का प्रभाव

1991 में भारत में नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था लागू की गई, जिसके तहत श्रमिक अधिकारों का हनन हुआ। अब ब्रिक्स+ इस बदलाव का प्रतीक बनता दिख रहा है, जिसे श्रमिक वर्ग को समझना चाहिए।