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भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका पर सवाल: विदेश मंत्री की टिप्पणी पर विचार

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका पर सवाल उठाए हैं, खासकर ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में। उन्होंने कहा कि भारत पाकिस्तान की तरह 'दलाली' नहीं कर सकता, लेकिन क्या यह उनकी विदेश नीति की विफलता का संकेत है? इस लेख में हम उनकी टिप्पणियों और भारत की कूटनीतिक स्थिति पर चर्चा करेंगे। क्या भारत की भूमिका वास्तव में कम हो गई है? जानें इस महत्वपूर्ण विषय पर और अधिक।
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भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका पर सवाल: विदेश मंत्री की टिप्पणी पर विचार

भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर चिंतन

विदेश मंत्री एस. जयशंकर को यह विचार करना चाहिए कि आज भारत की अंतरराष्ट्रीय मामलों में भूमिका क्यों कम हो गई है। इसके अलावा, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग क्यों महसूस करना पड़ा?


जब यह स्पष्ट हो गया कि प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर भाग नहीं लेंगे, तो ईरान युद्ध पर आयोजित सर्वदलीय बैठक केवल औपचारिकता बनकर रह गई। ऐसी बैठकों का महत्व तभी होता है जब उनका उद्देश्य सभी पक्षों के बीच पारदर्शिता के साथ आम सहमति बनाना हो। यह तभी संभव है जब देश के शीर्ष नेता बैठक में मौजूद रहें। केवल इसी स्थिति में संकट के समय पूरा देश एकजुट होकर बोल सकता है। हालांकि, नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में ऐसी राष्ट्रीय एकता दुर्लभ होती जा रही है। इसके परिणामस्वरूप, सर्वदलीय बैठकें राजनीतिक नैरेटिव को बढ़ावा देने का एक साधन बन गई हैं।


पश्चिम एशिया में युद्ध पर आयोजित बैठक का भी यही हाल हुआ। विपक्ष ने इसका उपयोग मोदी सरकार की कूटनीतिक विफलताओं को उजागर करने के लिए किया, यह कहते हुए कि इससे भारतीय जनता को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा है, जबकि भारत अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अप्रासंगिक होता जा रहा है। इस संदर्भ में पाकिस्तान के मध्यस्थ बनने की चर्चा भी हुई। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस पर चौंकाने वाली टिप्पणी की।


उन्होंने कहा कि भारत पाकिस्तान की तरह "दलाली" नहीं कर सकता! अमेरिका ने पाकिस्तान को मध्यस्थ क्यों बनाया और इस भूमिका को स्वीकार कर उसने क्या जोखिम उठाए, ये अलग सवाल हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को "दलाली" कहना अपनी विदेश नीति की गंभीर विफलता का संकेत है। भारत का कोरिया युद्ध, कॉन्गो युद्ध, और श्रीलंका के गृह युद्ध में मध्यस्थता का एक मजबूत रिकॉर्ड रहा है। यहां तक कि यूक्रेन युद्ध में प्रधानमंत्री मोदी ने संवाद और कूटनीतिक समाधान का संदेश दोनों पक्षों को दिया। इसलिए, जयशंकर को आत्म-निरीक्षण करना चाहिए कि आज अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत की भूमिका क्यों नहीं है। यह केवल "दलाल" न होने का गर्व दिखाना किसी काम का नहीं है, इससे केवल भारतीय जनमत के एक हिस्से को ही संतुष्ट किया जा सकता है।