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भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती पर आरबीआई गवर्नर का बयान

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती पर अपने विचार साझा किए हैं। उन्होंने वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत की मैक्रोइकोनॉमिक बुनियाद को मजबूत बताया। साथ ही, उन्होंने विकास दर, घरेलू मांग और बढ़ते सार्वजनिक कर्ज के मुद्दों पर भी चर्चा की। जानें उनके द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण बिंदुओं के बारे में।
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भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती पर आरबीआई गवर्नर का बयान

भारत की आर्थिक स्थिति पर आरबीआई गवर्नर का दृष्टिकोण


प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ता सार्वजनिक कर्ज चिंता का विषय


भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि (बिजनेस डेस्क): वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक परिवेश में निरंतर बदलाव के बीच, भारत ने अपनी विकास दर को बनाए रखने में सफलता प्राप्त की है। यह जानकारी आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने दी। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में नीतिगत सुधारों के चलते भारतीय वित्तीय बाजारों में परिपक्वता आई है, लेकिन अभी भी सुधार की आवश्यकता है।


आरबीआई वित्तीय बाजारों को और गहरा करने, भागीदारी बढ़ाने और संस्थागत ढांचे को मजबूत करने के लिए प्रयासरत है। गवर्नर ने कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत की मैक्रोइकोनॉमिक बुनियाद मजबूत बनी हुई है।


विकास दर का विश्लेषण

गवर्नर ने भारत की आर्थिक वृद्धि पर चर्चा करते हुए बताया कि 2021-25 के दौरान देश की औसत विकास दर 8.2% रही है। 2025-26 में 7.6% और 2026-27 में 6.9% की वृद्धि का अनुमान है। उन्होंने यह भी कहा कि कॉरपोरेट बैलेंस शीट्स मजबूत हुई हैं और पिछले दो वर्षों में पूंजी बाजारों के माध्यम से फंड जुटाने में तेजी आई है, जो अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त समर्थन दे रही है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ता सार्वजनिक कर्ज और रक्षा खर्च वैश्विक वित्तीय स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।


घरेलू मांग का महत्व

एम्स्टर्डम में आयोजित एक सम्मेलन में बोलते हुए, मल्होत्रा ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत घरेलू खपत और निरंतर सार्वजनिक निवेश का सहारा मिल रहा है। उन्होंने बताया कि सरकार के पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) पर जोर से निजी निवेश को बढ़ावा मिला है और उत्पादन क्षमता का विस्तार हुआ है।


चिंताओं का उल्लेख

गवर्नर ने वैश्विक स्तर पर वित्तीय विस्तार और बढ़ते रक्षा खर्च को लेकर चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार, इससे कई देशों की राजकोषीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही, उन्होंने तकनीकी क्षेत्र में कुछ परिसंपत्तियों के ऊंचे मूल्यांकन को भी बाजार के लिए संभावित खतरा बताया। मल्होत्रा ने कहा कि सप्लाई चेन में व्यवधान और ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का असर पहले ही आर्थिक गतिविधियों पर दिख रहा है।