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भारत-चीन संबंधों में नई दिशा: तियानजिन शिखर सम्मेलन की तैयारी

भारत और चीन के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात तियानजिन में होने जा रही है, जो दोनों देशों के रिश्तों में एक नया मोड़ ला सकती है। इस सम्मेलन में 20 देशों के नेता शामिल होंगे, और चीन अपनी आर्थिक और राजनीतिक ताकत को प्रदर्शित करने का प्रयास करेगा। भारत आतंकवाद के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाने की योजना बना रहा है। जानें इस महत्वपूर्ण सम्मेलन की सभी खास बातें और इसके संभावित प्रभाव।
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भारत-चीन संबंधों में नई दिशा: तियानजिन शिखर सम्मेलन की तैयारी

भारत और चीन के नेताओं की महत्वपूर्ण मुलाकात

नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, भारत इस दबाव में नहीं आया है। अब तियानजिन में होने वाले शिखर सम्मेलन में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद मिलेंगे। यह मुलाकात भारत-चीन संबंधों में एक नया मोड़ ला सकती है।
चीन के तियानजिन शहर में 31 अगस्त से 1 सितंबर तक शंघाई सहयोग संगठन का शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। इस सम्मेलन में भारत, रूस, पाकिस्तान, कजाखस्तान, किर्गिजस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान, बेलारूस और तुर्की सहित 20 देशों के नेता भाग लेंगे। इसके साथ ही, दस अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहेंगे। यह सम्मेलन पिछले एक दशक का सबसे बड़ा आयोजन है। इस मंच के माध्यम से चीन अमेरिका को यह संदेश देना चाहता है कि वह अब अकेला सुपरपावर नहीं है और वैश्विक राजनीति में एक नया गठबंधन तैयार हो चुका है। इस समय, मोदी और पुतिन की जोड़ी की उपस्थिति पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित कर रही है, और चीन अपने विरोधियों को स्पष्ट संदेश देने की कोशिश कर रहा है।


चीन की आर्थिक और राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन

चीन इस सम्मेलन के जरिए अपनी आर्थिक और राजनीतिक ताकत को प्रदर्शित करना चाहता है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग यह साबित करना चाहते हैं कि पश्चिमी दबाव का प्रभाव अब सीमित हो गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। वहीं, रूस पर अमेरिकी दबाव भी कमज़ोर हुआ है। ऐसे में, चीन पश्चिमी प्रभाव के विकल्प के रूप में खुद को पेश करेगा।


भारत-चीन संबंधों में सुधार

हाल के महीनों में भारत और चीन के बीच तनाव कम हुआ है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, रक्षा और विदेश मंत्रियों के बीच कई बैठकें हुई हैं। सीमा प्रबंधन के लिए नई संचार प्रणाली और विशेषज्ञ समूह बनाए गए हैं। प्रत्यक्ष उड़ानें फिर से शुरू हो गई हैं और कैलाश-मानसरोवर यात्रा को फिर से अनुमति दी गई है। हालांकि, दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास की कमी अभी भी बनी हुई है।


भारत की मल्टी-अलाइनमेंट नीति

भारत मल्टी-अलाइनमेंट नीति को आगे बढ़ाने में लगा हुआ है। मोदी इस सम्मेलन से पहले जापान-भारत वार्षिक बैठक में भी भाग लेंगे। इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि भारत न तो पूरी तरह अमेरिका के पक्ष में है और न ही चीन के सामने झुकने वाला है। यह मंच भारत को स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करने का अवसर प्रदान करेगा।


भारत का आतंकवाद पर सख्त रुख

भारत इस सम्मेलन में आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की योजना बना रहा है। हाल ही में, भारत ने एससीओ रक्षा मंत्रियों की बैठक में साझा बयान पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उसमें आतंकवाद के खिलाफ पर्याप्त कठोर भाषा नहीं थी। पाकिस्तान की उपस्थिति में, भारत इस मुद्दे को मजबूती से उठाएगा।