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भारत-बांग्लादेश के बीच शेख हसीना के प्रत्यर्पण पर बढ़ी कूटनीतिक गतिविधियां

भारत और बांग्लादेश के बीच पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण को लेकर कूटनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। बांग्लादेश के विदेश मंत्री की हालिया यात्रा के दौरान इस मुद्दे पर चर्चा हुई, जिसमें भारत ने अपना स्पष्ट रुख पेश किया। जानें इस मामले में क्या हो रहा है और इसके द्विपक्षीय संबंधों पर संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं।
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भारत-बांग्लादेश के बीच शेख हसीना के प्रत्यर्पण पर बढ़ी कूटनीतिक गतिविधियां

भारत और बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक चर्चाएं


भारत और बांग्लादेश के बीच पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण के मुद्दे पर कूटनीतिक गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं। हाल ही में बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने भारत का दौरा किया, जहां इस मुद्दे को औपचारिक रूप से उठाया गया। भारत सरकार ने इस पर अपना स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है।


भारत सरकार का आधिकारिक बयान

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि बांग्लादेश के प्रत्यर्पण अनुरोध की समीक्षा की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला अभी न्यायिक और कानूनी प्रक्रियाओं के अधीन है। भारत द्विपक्षीय वार्ता को जारी रखने के लिए तत्पर है, लेकिन अभी तक प्रत्यर्पण के लिए कोई निश्चित समयसीमा नहीं दी गई है।


बांग्लादेश की स्थिति

मॉरीशस में आयोजित '9वें हिंद महासागर सम्मेलन' के दौरान, बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने कहा कि ढाका अपनी मांग पर अडिग है। उन्होंने बताया कि बीएनपी के नेतृत्व वाली नई सरकार इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। बांग्लादेश ने शेख हसीना के खिलाफ 5 अगस्त 2024 को किए गए अपराधों के लिए प्रत्यर्पण की मांग की है।


दिल्ली में उच्च स्तरीय बैठकें

खलीलुर रहमान ने दिल्ली यात्रा के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ महत्वपूर्ण बैठकें कीं। इस वार्ता में बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा पर भी चर्चा हुई। भारत ने फिर से यह स्पष्ट किया कि वह बांग्लादेश की जनता के सर्वोत्तम हितों और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रति प्रतिबद्ध है।


द्विपक्षीय संबंधों पर प्रभाव

शेख हसीना भारत की एक विश्वसनीय सहयोगी रही हैं। वह 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद भारत आ गई थीं और तब से यहीं रह रही हैं। उनके प्रत्यर्पण का मुद्दा बांग्लादेश की नई सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विषय बन गया है, जबकि भारत के लिए यह कानूनी और कूटनीतिक दृष्टि से एक चुनौतीपूर्ण मामला है।