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भारत में दूषित जल संकट: समाधान के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता

भारत में दूषित जल संकट एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जिसमें लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं। हाल के आंकड़ों के अनुसार, दूषित पानी से बीमारियों की संख्या बढ़ रही है, और कई मौतें हो रही हैं। प्रमुख नदियों का प्रदूषण, अनुपचारित सीवेज, और कृषि रसायनों के कारण जल गुणवत्ता में गिरावट आई है। इस संकट का समाधान बहुआयामी दृष्टिकोण से ही संभव है, जिसमें उद्योगों को अपशिष्ट उपचार संयंत्र स्थापित करने, जैविक खेती को बढ़ावा देने और सीवेज उपचार को 100% करने की आवश्यकता है। जानें इस समस्या के पीछे के कारण और इसके समाधान के लिए उठाए जाने वाले कदम।
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भारत में दूषित जल संकट: समाधान के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता

दूषित जल की समस्या का समाधान

दूषित जल की समस्या का समाधान संभव है, यदि बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया जाए। सबसे पहले, स्रोत पर प्रदूषण को रोकना जरूरी है। उद्योगों को अपशिष्ट उपचार संयंत्र स्थापित करने के लिए बाध्य किया जाए। कृषि में जैविक खेती को प्रोत्साहित करें ताकि रसायनों का अपवाह कम हो। सीवेज उपचार को 100% बनाना चाहिए, जो वर्तमान में अपर्याप्त है। आंकड़े बताते है कि पश्चिमी देशों के अनुभव काफ़ी उपयोगी साबित हुए हैं।


भारत, जो दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश है, आज दूषित जल के गंभीर संकट का सामना कर रहा है। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2025-2026 में, दूषित नल के पानी से 5,500 से अधिक लोग बीमार हुए और 34 मौतें राष्ट्रीय समस्या की वास्तविकता को दर्शाती हैं। भारत की प्रमुख नदियां, जैसे गंगा और यमुना, औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित सीवेज और कृषि कचरे से बुरी तरह प्रभावित हैं। विश्व जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में से 120वें स्थान पर है और लगभग 70% भूजल स्रोत दूषित हैं।


दूषित जल की समस्या भारत में बहुआयामी है। मुख्य कारणों में अनुपचारित सीवेज सबसे बड़ा है, जो नदियों और भूजल को प्रदूषित करता है। इसके अलावा, कृषि से निकलने वाले कीटनाशक और उर्वरक, तथा उद्योगों से निकलने वाले रसायन जैसे भारी धातु और विषाक्त पदार्थ जल स्रोतों को नष्ट कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, कपड़ा और चमड़ा उद्योगों से निकलने वाला अपशिष्ट कई नदियों को प्रभावित कर रहा है। 163 मिलियन भारतीयों के पास सुरक्षित पेयजल की पहुंच नहीं है और 21% संक्रामक रोग जल से संबंधित हैं।


हाल ही में इंदौर और अन्य शहरों के घटनाक्रमों ने इस समस्या को और उजागर किया है। इंदौर में दूषित पानी से कम से कम 8 मौतें हुईं, लेकिन रिकॉर्ड दिखाते हैं कि 18 परिवारों को मुआवजा दिया गया। यह असंगति सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठाती है। पूरे देश में टाइफाइड जैसे रोग फैल रहे हैं, जो दूषित पानी से जुड़े हैं।


आर्थिक दृष्टि से, यह संकट उत्पादकता को प्रभावित करता है, क्योंकि बीमारियां कार्यबल को कमजोर करती हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से, यह जैव विविधता को भी नुकसान पहुंचाता है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बढ़ाता है। 2025-2027 में जल की कमी भारत के लिए सबसे बड़ा पर्यावरणीय जोखिम साबित हो सकती है। यदि इसे नजरअंदाज किया गया, तो ‘डे जीरो’ की स्थिति कई राज्यों में आ सकती है।


सरकार की उदासीनता इस समस्या का एक प्रमुख कारण है। केंद्र सरकार पर आरोप है कि वह स्वच्छ जल और स्वच्छ हवा प्रदान करने में विफल रही है। विपक्षी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधान मंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष के अनुसार मुख्य कारणों में कमी नियमों की है, अत्यधिक निजीकरण, सरकारी भ्रष्टाचार और सामान्य उपेक्षा शामिल हैं। मध्य प्रदेश में इंदौर घटना के बाद नगर आयुक्त को हटाया गया और दो अधिकारियों को निलंबित किया गया, लेकिन विपक्ष इसे केवल प्रतिक्रियात्मक कदम मानता है।


राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार चुनावी वादे जैसे ‘हर घर जल’ योजना लागू तो हुई, लेकिन गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया। दिल्ली जल बोर्ड को सख्त जांच के निर्देश दिए गए, लेकिन शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की कमी पाई गई है। भ्रष्टाचार के कारण फंड का दुरुपयोग होता है और स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचा अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर, जल गुणवत्ता 2025-26 में एक प्रमुख चुनौती है, लेकिन इस गंभीर चुनौती को कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) को स्थानांतरित करने के बजाय सरकार को अधिक सक्रिय होना चाहिए। यह उदासीनता न केवल स्वास्थ्य संकट पैदा करती है, बल्कि सामाजिक असमानता को भी बढ़ाती है, क्योंकि इससे गरीब तबके के लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।


दूषित जल की समस्या का समाधान संभव है, यदि बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया जाए। सबसे पहले, स्रोत पर प्रदूषण को रोकना जरूरी है। उद्योगों को अपशिष्ट उपचार संयंत्र स्थापित करने के लिए बाध्य किया जाए। कृषि में जैविक खेती को प्रोत्साहित करें ताकि रसायनों का अपवाह कम हो। सीवेज उपचार को 100% बनाना चाहिए, जो वर्तमान में अपर्याप्त है।


आंकड़े बताते है कि पश्चिमी देशों के अनुभव काफ़ी उपयोगी साबित हुए हैं। स्विट्जरलैंड में शहरी जल उपचार की गुणवत्ता सर्वोच्च है और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वहां का नल का पानी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है। वे ब्लू रिवोल्यूशन’ रणनीति कुशल उपयोग, अपशिष्ट कमी और पारिस्थितिक संतुलन पर जोर देती है। प्रबंधित एक्विफर रिचार्ज (एमएआर) जैसी विधियां अपनाई जाती हैं, जिसमें नदी तलों को समायोजित करना, बैंक फिल्ट्रेशन, सतही पानी का वितरण और रिचार्ज कुओं का उपयोग शामिल है।


वहीं अमेरिका और यूरोप में मेम्ब्रेन सेपरेशन टेक्नोलॉजी, सोलर वाटर डिसइंफेक्शन (एसओडीआईएस) और सिरेमिक फिल्ट्रेशन जैसी तकनीकें आम हैं। यूरोपीय संघ में जल बचत पर जोर है, विभिन्न क्षेत्रों में दक्षता बढ़ाने के लिए। काउंसिल ऑफ यूरोपियन बैंक ने 16 देशों में जल और स्वच्छता परियोजनाओं में 1.8 बिलियन यूरो का निवेश किया है। प्रकृति-आधारित समाधान (एनबीएस) यूरोप में जल प्रबंधन में उपयोगी हैं, जैसे वेटलैंड्स और वन क्षेत्रों का उपयोग फिल्टर के रूप में किया जाना।


भारत को पश्चिमी अनुभवों से सीखते हुए उनके सफल उपाय को अपनाना चाहिए। अमेरिका की तरह, पर्यावरण संरक्षण एजेंसी जैसी स्वतंत्र संस्था बनाएं जो प्रदूषण पर नजर रखे। जुर्माने और जेल की सजा लागू करें। यूरोप में पौधे लगाएं, हालांकि उनके नुकसानों को ध्यान में रखें। हर घर में फिल्टर सिस्टम अनिवार्य करें। स्विट्जरलैंड मॉडल अपनाएं, अपशिष्ट जल को पुन: उपयोग योग्य बनाएं। एमएआर तकनीक से भूजल रिचार्ज करें। स्थानीय समुदायों को शामिल करने पर भी ज़ोर दिया जाए, जैसे यूरोप में एनबीएस परियोजनाओं के तहत शिक्षा अभियान चलाए जाते हैं जिससे कि लोग जल संरक्षण करते हैं। नवीनतम तकनीकी का नवाचार करने पर भी ज़ोर देने की आवश्यकता है।


इसके साथ ही सरकारी तंत्र के पारदर्शिता को बढ़ाए जाने की भी ज़रूरत है। इंदौर के उदाहरण को देखते हुए राष्ट्रीय जल नीति को मजबूत करें, जिसमें जलवायु परिवर्तन को भी शामिल किया जाए। ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा कि दूषित जल भारत की प्रगति में बाधा है, लेकिन पश्चिमी देशों के सफल मॉडल से प्रेरणा लेकर हम इसे हल कर सकते हैं। सरकार को उदासीनता छोड़कर सक्रिय होना चाहिए, अन्यथा यह संकट और गहराएगा। स्वच्छ जल राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए।