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भारत में पुरुष नसबंदी की कमी: परिवार नियोजन की जिम्मेदारी महिलाओं पर

भारत में पुरुष नसबंदी की दर बेहद कम है, जबकि परिवार नियोजन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से महिलाओं पर है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 के अनुसार, 56.9% महिलाएं नसबंदी करवा चुकी हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा केवल 0.5% है। सामाजिक कलंक और अज्ञानता के कारण पुरुष नसबंदी से कतराते हैं। डॉ. जावेद अख्तर के अनुसार, जागरूकता की कमी और पारंपरिक सोच इस समस्या के मुख्य कारण हैं। जानें इस मुद्दे पर और क्या कहा गया है और कैसे सुधार संभव है।
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भारत में पुरुष नसबंदी की कमी: परिवार नियोजन की जिम्मेदारी महिलाओं पर

परिवार नियोजन में महिलाओं की प्रमुखता

भारत में पुरुष नसबंदी को लेकर एक स्पष्ट झिझक है, और परिवार नियोजन का बोझ मुख्य रूप से महिलाओं पर है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 के अनुसार, 56.9 प्रतिशत महिलाएं फीमेल स्टेरलाइजेशन करवा चुकी हैं। वहीं, पुरुषों में वेसेक्टॉमी का प्रतिशत लगभग नगण्य है, केवल 0.5 प्रतिशत पुरुषों ने इस विकल्प को अपनाया है। यह स्थिति 21वीं सदी में भी बनी हुई है।


महिलाओं का परिवार नियोजन में योगदान

सर्वे में 15 से 49 वर्ष की विवाहित महिलाओं के आंकड़ों को शामिल किया गया है। देश में 60.3% महिलाएं किसी न किसी प्रकार का परिवार नियोजन कर रही हैं, जिनमें से 57.6% आधुनिक तरीकों का उपयोग कर रही हैं, जबकि केवल 2.7% पारंपरिक तरीकों पर निर्भर हैं।


पुरुष नसबंदी पर सामाजिक दबाव

पुरुष नसबंदी, महिला नसबंदी की तुलना में अधिक सरल प्रक्रिया है, फिर भी सामाजिक कलंक और अज्ञानता के कारण पुरुष इसे अपनाने से कतराते हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 से 2021 के बीच केवल 2 पॉइंट का सुधार हुआ है। 2023-24 में, केवल 0.5 प्रतिशत पुरुषों ने नसबंदी कराई, जबकि 2019-2021 के बीच यह आंकड़ा 0.3 प्रतिशत था।


पुरुष नसबंदी से बचने के कारण

आयशा हेल्थ केयर के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. जावेद अख्तर के अनुसार, सांस्कृतिक मान्यताएं और पारंपरिक सोच के कारण परिवार नियोजन का बोझ महिलाओं पर ही आ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी गंभीर है, जहां 62.8 प्रतिशत महिलाओं ने नसबंदी कराई है।


पुरुष नसबंदी की प्रक्रिया

डॉ. जावेद अख्तर, मैनेजिंग डायरेक्टर, आयशा हेल्थ केयर:-
पुरुषों की नसबंदी को वेसेक्टॉमी कहा जाता है। यह एक छोटी प्रक्रिया है, जिसमें कोई चीरा नहीं लगता और यह आधे घंटे से भी कम समय में पूरी हो जाती है। पुरुष ऑपरेशन के बाद उसी दिन घर जा सकते हैं और एक सप्ताह के भीतर सामान्य गतिविधियों में लौट सकते हैं।


पुरुषों के डर और भ्रांतियाँ

डॉ. जावेद अख्तर ने बताया कि जागरूकता की कमी पुरुष नसबंदी की सबसे बड़ी बाधा है। लोगों का मानना है कि नसबंदी कराने से वे नपुंसक हो जाएंगे, जबकि सच्चाई यह है कि नसबंदी का कोई प्रभाव यौन क्षमता पर नहीं पड़ता।


महिला नसबंदी की जटिलता

डॉ. जावेद अख्तर ने कहा कि महिलाओं की नसबंदी अधिक जटिल होती है, जिसमें पेट के अंदर सर्जरी करनी पड़ती है। ऑपरेशन के बाद रिकवरी में दो हफ्ते लग सकते हैं, और संक्रमण या अधिक खून बहने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।


सुधार की संभावनाएँ

डॉ. जावेद अख्तर ने सुझाव दिया कि चाहे शहर हो या गांव, लोग मान लेते हैं कि उनकी महिला साथी ही नसबंदी कराएगी। यह सोच बदलने की आवश्यकता है। कई महिलाएं भी अपने पतियों को नसबंदी कराने से रोकती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनकी यौन क्षमता प्रभावित होगी। वास्तव में, यह एक गलत धारणा है। देश में सेक्स शिक्षा की स्थिति को सुधारने की आवश्यकता है।