भारत में बढ़ती प्रतिस्पर्धा: एक अघोषित गृहयुद्ध का सामना
भारत की आंतरिक लड़ाई
भारत में एक अनकही गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई है। पहले केकड़ों की कहावत अब छोटी लगने लगी है, क्योंकि अब वे एक-दूसरे की आँखें नोचने लगे हैं। देश के हर क्षेत्र में आंतरिक संघर्ष चल रहा है। पत्रकार यूट्यूबर्स से भिड़ रहे हैं, और यूट्यूबर्स पत्रकारों पर हमलावर हैं। इन्फ्लुएंसर्स विशेषज्ञों को निशाना बना रहे हैं, जबकि टीवी चैनल डिजिटल प्लेटफार्मों को दोषी ठहरा रहे हैं। पुरानी प्रतिष्ठा नई प्रतिष्ठा से टकरा रही है। अर्थशास्त्री उद्योगपतियों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, और उद्योगपति अर्थशास्त्रियों को नाकाम साबित कर रहे हैं। हर जगह संघर्ष है, लेकिन कोई यह नहीं पूछ रहा कि इस लड़ाई में हम क्या खो रहे हैं।
संघर्ष का असली कारण
यह लड़ाई अब विचारों की नहीं रह गई है। यह संस्थाओं को सुधारने की कोशिश भी नहीं है। यह एक-दूसरे को हराने और अपनी प्रासंगिकता साबित करने की लड़ाई बन गई है। यह प्रक्रिया अब वायरल होने की होड़ में बदल गई है।
टीवी एंकर और यूट्यूब शिक्षक एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं कि वे भारत को बर्बाद कर रहे हैं। हिंदी टीवी के एंकर यूट्यूब शिक्षकों पर हमले कर रहे हैं, और यूट्यूब शिक्षक भी उसी तर्ज पर जवाब दे रहे हैं। एक पक्ष का कहना है कि सेलिब्रिटी शिक्षक शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद कर रहे हैं, जबकि दूसरा पक्ष टीवी पत्रकारिता को सार्वजनिक विमर्श को नष्ट करने का दोषी मानता है। दोनों पक्षों के दर्शक यह मानते हैं कि पतन का कारण दूसरा पक्ष है। असलियत यह है कि दोनों आंशिक रूप से सही हैं।
पेशेवर संघर्ष
पत्रकार अब पत्रकारिता की रक्षा करने के बजाय एक-दूसरे से लड़ने में व्यस्त हैं। शिक्षक शिक्षा की रक्षा करने के बजाय अन्य शिक्षकों पर हमले कर रहे हैं। राजनेता लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय अपने विरोधियों को खत्म करने में लगे हैं। यह समय की सबसे बड़ी विडंबना है।
हर समूह को लगता है कि वह अपने पेशे की रक्षा कर रहा है, लेकिन असल में वे उसी पेशे की नींव को कमजोर कर रहे हैं। कोई भी अपने बाहर खड़े होकर आईने में देखने को तैयार नहीं है।
संस्थागत पतन
यह केवल एक पेशे की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक धीमी प्रक्रिया है जो गणराज्य की संस्थाओं को भीतर से खोखला कर रही है। यह सब खुली आँखों के सामने हो रहा है, लेकिन एक-दूसरे की आँखें नोचने का शोर इतना अधिक है कि पीछे हो रही टूटन दिखाई नहीं देती।
परीक्षाओं के प्रश्नपत्र अब लीक हो रहे हैं। नीट 2026 की परीक्षा में 22 लाख से अधिक छात्रों ने भाग लिया, लेकिन प्रश्नपत्र लीक होने के आरोपों के चलते इसे रद्द करना पड़ा। इसके बाद कई छात्रों ने आत्महत्या की। यह कोई अकेली घटना नहीं है।
समाज में बढ़ती असमानता
पत्रकार अब खबरों से ज्यादा व्यक्तित्व बन गए हैं। खबरें अब विभाजन पैदा करने और गुस्से को बढ़ाने का काम कर रही हैं। अदालतों में न्याय की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि यह एक सैद्धांतिक विचार बनकर रह जाती है।
हर पेशा अब स्वार्थ का प्रतीक बन चुका है। यूट्यूबर से लड़ता पत्रकार पत्रकारिता नहीं कर रहा है। विरोधी को मिटाने में जुटा राजनेता लोकतंत्र की रक्षा नहीं कर रहा है। लेकिन हर कोई दावा करता है कि वह राष्ट्रहित में काम कर रहा है।
संघर्ष का अंत
भारत जिस संकट का सामना कर रहा है, वह अचानक नहीं आया है। यह एक धीमी सड़न है, जिसका नाम लेने से जिम्मेदार लोग बचते हैं। हम तर्क करते हैं, बहाने बनाते हैं और दोष दूसरे पर डालते हैं।
जब तक सच्चाई स्पष्ट नहीं होगी, तब तक यह सच हो चुकी होगी। त्रासदी यह है कि हर केकड़ा सोचता है कि घाव दूसरे के शरीर पर है, जबकि चारों ओर का पानी धीरे-धीरे सूख रहा है।
