भारत में मजहबी कट्टरता: एक गंभीर समस्या का सामना
मजहबी कट्टरता का वास्तविक चेहरा
वामपंथी और स्वघोषित सेकुलरवादी अक्सर भारत में मजहबी कट्टरता और आतंकवाद को मुस्लिम समुदाय की 'अशिक्षा, बेरोजगारी और गरीबी' का परिणाम मानते हैं। हालाँकि, पिछले वर्ष दिल्ली में मुस्लिम चिकित्सकों द्वारा किए गए फिदायीन हमले और नासिक में पढ़े-लिखे 'व्हाइट कॉलर' कर्मचारियों पर लगे संगठित मतांतरण के आरोपों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जिहाद का आर्थिक, शैक्षणिक या सामाजिक स्थिति से कोई संबंध नहीं है।
सच्चाई से मुंह मोड़कर समाज को मजबूत नहीं बनाया जा सकता। जब किसी संकट को जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता है, तो वह और भी गहरा हो जाता है। स्वतंत्र भारत में दशकों से यही हो रहा है, जहाँ स्वघोषित सेकुलरवादी हर असुविधाजनक तथ्य को दबाने या 'प्रोपेगेंडा' कहकर खारिज करने की कोशिश कर रहे हैं।
यह विडंबना है कि इन उपदेशों का परिणाम न तो शांति के रूप में दिखा है और न ही सौहार्द के रूप में। जब भी समाज में कटुता बढ़ी, तो इसका ठीकरा आसानी से आरएसएस-भाजपा पर फोड़ दिया जाता है, मानो पूरी समस्या वहीं से शुरू होती हो।
जो लोग हिंदू को 'कट्टर' और 'नफरती' कहने में देर नहीं लगाते, वे नासिक प्रकरण पर या तो चुप हैं या इसे 'निजी रंजिश' का नाम दे रहे हैं। आरोप है कि 'टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज' से जुड़े मुस्लिम कर्मचारी, विशेषकर आर्थिक-सामाजिक रूप से कमजोर हिंदू युवतियों को प्रेमजाल में फंसाकर मतांतरण के लिए दबाव बना रहे थे।
यह घटना अकेली नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक ऐसी प्रवृत्ति है जो दशकों से चल रही है, जिसमें छल, फरेब, शोषण और दबाव का एक सुनियोजित ताना-बाना छिपा है। इसकी जड़ें वैचारिक और धार्मिक आधार में मिलती हैं, जिसमें इस्लाम का प्रसार करके 'सवाब' मिलने की अवधारणा है।
उत्तर प्रदेश के लखनऊ में डॉ. रमीजुद्दीन और उनके परिवार पर आरोप है कि उन्होंने हिंदू महिलाओं को फंसाकर उनका शारीरिक उत्पीड़न किया और मतांतरण के लिए मजबूर किया। इसी तरह उत्तराखंड के देहरादून में एक मुस्लिम छात्रा पर अपनी हिंदू सहपाठी को मतांतरण के लिए प्रेरित करने का मामला चल रहा है।
हाल ही में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और अलीगढ़ में मतांतरण के मामलों का भंडाफोड़ हुआ था, जिसमें रेलवे पुलिसकर्मी इरशाद खान और अन्य पर हिंदू महिलाओं का यौन-शोषण और मतांतरण करने का आरोप है।
अजमेर में 1992 का प्रकरण इस प्रवृत्ति का भयावह उदाहरण है, जिसमें सैकड़ों हिंदू छात्राओं को निशाना बनाया गया।
यह मान लेना गलत होगा कि संगठित मजहबी प्रवृत्ति हालिया है। 'लव-जिहाद' की संज्ञा भले ही नई हो, लेकिन हिंदू-ईसाई समाज इस पर चिंता व्यक्त कर रहा है।
अब तक वामपंथी और स्वयंभू सेकुलरवादी मजहबी कट्टरता को मुस्लिम समाज की 'अशिक्षा, बेरोजगारी और गरीबी' का परिणाम मानते रहे हैं। लेकिन हाल के घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि जिहाद का आर्थिक या सामाजिक स्थिति से कोई संबंध नहीं है।
सामाजिक संबंधों में मजहब या जाति की दीवार नहीं होनी चाहिए, लेकिन जब संबंध की नींव छल और दबाव पर हो, तो उसे 'प्रेम' कहना अन्याय होगा।
