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भारत में सौर ऊर्जा संकट: भंडारण की कमी से बढ़ी समस्याएं

भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन के ढांचे में भंडारण की कमी के कारण एक गंभीर बिजली संकट उत्पन्न हो गया है। जब सूरज ढलता है, तो सौर पैनल बिजली देना बंद कर देते हैं, जिससे पॉवर ग्रिड में रुकावटें आती हैं। सिटी बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, सौर ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि के बावजूद, ट्रांसमिशन में रुकावटें और कमजोर भंडारण व्यवस्था के कारण बिजली कटौती की समस्या बढ़ रही है। इस लेख में, हम इस संकट के कारणों और इसके प्रभावों पर चर्चा करेंगे, साथ ही यह भी जानेंगे कि क्या कोई इस समस्या से निपटने के लिए तैयार है।
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भारत में सौर ऊर्जा संकट: भंडारण की कमी से बढ़ी समस्याएं

सौर ऊर्जा की चुनौतियाँ

सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए स्थापित ढांचे में बिजली के भंडारण की उचित व्यवस्था का अभाव है। इसके परिणामस्वरूप, सौर पैनल केवल तब बिजली उत्पन्न करते हैं जब सूरज की रोशनी होती है। इसके बाद, ग्रिड में समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं।


यदि योजना स्पष्ट न हो, तो उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो पाता, और इसका उदाहरण भारत का बिजली क्षेत्र है। देश एक अनोखी समस्या का सामना कर रहा है, जिसे 'गैर-सौर घंटा संकट' कहा जाता है। शाम होते ही, जब सौर पैनल बिजली देना बंद कर देते हैं, तो पॉवर ग्रिड में रुकावटें आने लगती हैं। इसका कारण यह है कि सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए स्थापित ढांचे में बिजली के भंडारण की व्यवस्था नहीं की गई है। इस वजह से, सौर पैनलों से केवल तब बिजली मिलती है जब सूरज चमकता है, और इस दौरान उत्पन्न अतिरिक्त बिजली बर्बाद हो जाती है।


ये तथ्य सिटी बैंक से संबंधित एक शोध टीम की रिपोर्ट में सामने आए हैं। ग्रिड डेटा के अनुसार, भारत की बिजली समस्या अब केवल विद्युत उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि सूर्यास्त के बाद बिजली की विश्वसनीय आपूर्ति बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गई है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन में तेजी आई है, लेकिन 'ट्रांसमिशन में रुकावटें, कमजोर भंडारण व्यवस्था और विद्युत प्रणाली में लचीलापन की कमी' के कारण बिजली कटौती की समस्या गंभीर बनी हुई है।


अप्रैल में अचानक गर्मी बढ़ने से बिजली की मांग में तेजी आई, जिसके कारण सौर ऊर्जा से अपेक्षित आपूर्ति में औसतन 23 गीगावॉट की कमी आई। हालांकि यह रिपोर्ट बिजली के संदर्भ में है, लेकिन अन्य क्षेत्रों में भी योजना की कमी का अनुभव सामान्य है। निर्माण के समय यह नहीं सोचा जाता कि इससे जुड़े अन्य क्या मुद्दे हो सकते हैं या भविष्य में कौन सी समस्याएँ आ सकती हैं। इसके परिणामस्वरूप, धन और अन्य संसाधनों की भारी बर्बादी होती है। यह समस्या नई नहीं है, लेकिन जब से योजना को नकारात्मक रूप से देखा जाने लगा है, तब से यह और गंभीर हो गई है। यह एक सबक है कि संसाधनों के बावजूद, बिना ठोस पूर्व-योजना के विकास और प्रगति सुनिश्चित नहीं की जा सकती। लेकिन क्या कोई इस सबक को सीखने के लिए तैयार है?