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भारत में स्कूल छोड़ने की दर में चिंताजनक वृद्धि: नीति आयोग की रिपोर्ट

नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट में भारत में स्कूल छोड़ने की दर में चिंताजनक वृद्धि का खुलासा हुआ है। कक्षा 1 से 5 तक के छात्रों में से 0.3 प्रतिशत हर साल स्कूल छोड़ देते हैं, जबकि 9वीं से 12वीं तक के 11.5 प्रतिशत छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं। पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में यह दर सबसे अधिक है। रिपोर्ट में शिक्षकों की कमी और अन्य संरचनात्मक खामियों को भी उजागर किया गया है, जो छात्रों के स्कूल छोड़ने के पीछे मुख्य कारण हैं।
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भारत में स्कूल छोड़ने की दर में चिंताजनक वृद्धि: नीति आयोग की रिपोर्ट

स्कूल छोड़ने की दर पर नीति आयोग की रिपोर्ट

नीति आयोग ने अपनी नई रिपोर्ट 'स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया' में बताया है कि कक्षा 1 से 5 तक पढ़ाई करने वाले छात्रों में से 0.3 प्रतिशत हर साल स्कूल छोड़ देते हैं। वहीं, 5वीं से 8वीं कक्षा के 3.5 प्रतिशत छात्र 9वीं कक्षा में नहीं पहुंच पाते। 9वीं से 12वीं कक्षा के बीच 11.5 प्रतिशत छात्र हायर सेकेंड्री में पढ़ाई छोड़ देते हैं।


राज्यों में स्कूल छोड़ने की दर

पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक 20 प्रतिशत बच्चे स्कूल छोड़ते हैं। अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक में यह आंकड़ा 18.3 प्रतिशत है। असम में 17.5 प्रतिशत, जबकि मिजोरम और मेघालय में 17.4 प्रतिशत बच्चे 9वीं से 12वीं के बीच पढ़ाई छोड़ देते हैं।


राज्यवार आंकड़े

गुजरात में 16.9 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 16.8 प्रतिशत छात्रों ने पढ़ाई छोड़ दी है। लद्दाख में 16.2 प्रतिशत बच्चे सेकेंड्री एजुकेशन से आगे नहीं बढ़ पाते। आंध्र प्रदेश में यह दर 15.5 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 15.3 प्रतिशत, ओडिशा में 15 प्रतिशत, और तेलंगाना तथा जम्मू-कश्मीर में यह दर 12-15 प्रतिशत के बीच है।


सुधार के संकेत

2024-2025 की रिपोर्ट में चंडीगढ़, झारखंड, लक्षद्वीप, उत्तराखंड और केरल जैसे राज्यों में सुधार के संकेत मिले हैं। यहां स्कूल छोड़ने की दर अन्य राज्यों की तुलना में कम है।



  • झारखंड: 3.5 प्रतिशत

  • लक्षद्वीप: 4.1 प्रतिशत

  • चंडीगढ़: 2.0 प्रतिशत

  • केरल: 4.8 प्रतिशत

  • उत्तराखंड: 4.6 प्रतिशत


शिक्षकों की कमी का प्रभाव

नीति आयोग ने यह भी बताया है कि शिक्षकों की कमी के कारण छात्रों का स्कूलों से मोहभंग हो रहा है। बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश में सबसे अधिक पद रिक्त हैं। बिहार में प्राथमिक स्तर पर 2.08 लाख से अधिक पद खाली हैं, जबकि 5वीं से 8वीं कक्षा के स्कूलों में 36,035 और 8वीं से 12वीं कक्षा के लिए 33,035 पद रिक्त हैं।


सरकार की चिंताएं


  • संरचनात्मक खामियां: रिपोर्ट में बताया गया है कि स्कूलों में स्थानीय स्तर पर सरकारी समर्थन कमजोर है। कई स्कूलों में कमरे नहीं हैं और पद रिक्त हैं।

  • पदों की कमी: ब्लॉक और जिला स्तर पर 50-60 प्रतिशत पद खाली हैं, जिससे निगरानी प्रभावित हो रही है।

  • शिक्षण की गुणवत्ता: शिक्षकों की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं, क्योंकि कई शिक्षक अपने विषय में विशेषज्ञता नहीं रखते।

  • अतिरिक्त कार्य का बोझ: ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों पर अतिरिक्त कार्य का बोझ है, जिससे उनकी पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

  • अंक प्राप्ति में कमी: कई शिक्षक ऐसे हैं जो 60 से 70 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं कर पाते।


चिंताजनक आंकड़े

सरकारी स्कूलों से अभिभावकों का मोहभंग बढ़ रहा है। 2005 में 71 प्रतिशत नामांकन अब घटकर 49 प्रतिशत रह गया है। प्राइवेट स्कूलों की स्थिति भी कुछ बेहतर नहीं है। पाठ्यक्रम और शिक्षण शैली में असमानता के कारण बच्चों की बुनियादी समझ विकसित नहीं हो पा रही है।