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भारतीय रुपये में गिरावट: जानें इसके कारण और प्रभाव

भारतीय रुपये में गिरावट जारी है, जो हाल ही में 95.7450 के नए निम्नतम स्तर पर पहुंच गया है। मोदी सरकार ने सोने और चांदी पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाने के बावजूद रुपये की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। इस लेख में, हम रुपये की गिरावट के पीछे के कारणों, जैसे जियोपॉलिटिकल तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, और विदेशी निवेशकों की निकासी पर चर्चा करेंगे। इसके अलावा, हम यह भी देखेंगे कि यह गिरावट भारत में महंगाई और अन्य आर्थिक पहलुओं को कैसे प्रभावित कर रही है।
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भारतीय रुपये में गिरावट: जानें इसके कारण और प्रभाव

भारतीय रुपये की स्थिति

रुपया बनाम डॉलर: मोदी सरकार ने सोने और चांदी पर कस्टम ड्यूटी को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया है। इसके बावजूद, भारतीय रुपये की गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही है। बुधवार को, रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.1 प्रतिशत की कमी के साथ 95.7450 के नए निम्नतम स्तर पर पहुंच गया। मंगलवार को भी रुपये ने 40 पैसे की गिरावट के साथ 95.68 के सर्वकालिक निचले स्तर पर बंद किया था, जबकि इंट्रा-डे ट्रेडिंग में यह 95.7375 तक गिर गया था।


एशियाई मुद्राओं में रुपये का प्रदर्शन

रुपया एशियाई मुद्राओं में सबसे कमजोर: 2026 में अब तक, रुपये ने डॉलर के मुकाबले 6.5 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की है, जिससे यह एशियाई मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गई है। सरकार ने हाल ही में सोने और चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाने का निर्णय लिया है, जो पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि को देखते हुए किया गया है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत और व्यापार घाटे को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है। इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये ने 95.52 प्रति डॉलर पर शुरुआत की, जो पिछले बंद भाव से 16 पैसे की मजबूती दर्शाता है। हालांकि, दिन के दूसरे हिस्से में रुपये पर दबाव बढ़ गया और इसमें गिरावट आई।


प्रधानमंत्री की अपील और सरकार के कदम

प्रधानमंत्री की अपील: रुपये में गिरावट को देखते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से विदेशी मुद्रा भंडार की रक्षा करने की अपील की थी। उन्होंने लोगों से फिजूलखर्ची कम करने और आर्थिक अनुशासन बनाए रखने का आग्रह किया। इसी संदर्भ में, सरकार ने मंगलवार रात कीमती धातुओं के आयात पर टैरिफ बढ़ा दिए थे ताकि डॉलर के बाहर जाने की गति को कम किया जा सके। ट्रेडर्स का मानना है कि भविष्य में रुपये में और गिरावट संभव है।


करेंसी की कीमत कैसे निर्धारित होती है?

मुद्रा का मूल्य निर्धारण: डॉलर के मुकाबले किसी मुद्रा की कीमत में कमी को मुद्रा का गिरना या कमजोरी कहा जाता है। हर देश के पास विदेशी मुद्रा भंडार होता है, जिसका उपयोग अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए किया जाता है। यदि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की मात्रा पर्याप्त है, तो रुपये की स्थिति स्थिर रहेगी। डॉलर की कीमत में वृद्धि से रुपये की कीमत में कमी आएगी।


रुपये में गिरावट के कारण

जियोपॉलिटिकल तनाव: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ईरान के साथ संघर्ष विराम को कमजोर बताने से खाड़ी देशों में तनाव बढ़ गया है। इससे निवेशक उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश की ओर बढ़ रहे हैं।

कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि: ईरान संकट के कारण वैश्विक बाजार में आपूर्ति में रुकावट का डर है, जिससे ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 105 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80% तेल आयात करता है, जिससे तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपये की स्थिति कमजोर होती है।

बढ़ता व्यापार घाटा: कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत का आयात बिल भी बढ़ता है, जिससे देश का 'करेंट अकाउंट डेफिसिट' बढ़ने की आशंका होती है, जो रुपये की वैल्यू को कम करता है।

डॉलर की मजबूती: वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में 'अमेरिकी डॉलर' को सबसे सुरक्षित संपत्ति माना जाता है। ट्रम्प के कड़े रुख के बाद, डॉलर की मांग में वृद्धि हुई है, जिससे रुपये सहित अन्य मुद्राएं दबाव में हैं।

विदेशी निवेशकों की निकासी: वैश्विक जोखिम बढ़ने पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना निवेश निकालकर डॉलर में वापस ले जाते हैं, जिससे रुपये की कीमत में गिरावट आती है।


महंगाई का खतरा

महंगाई का बढ़ता खतरा: मध्य पूर्व संघर्ष को दशकों का सबसे गंभीर ऊर्जा संकट माना जा रहा है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत का इम्पोर्ट बिल बढ़ गया है। आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ने की संभावना है, जैसे LPG, प्लास्टिक और अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पाद। डॉलर की महंगाई से पेट्रोल-डीजल और आयातित सामान महंगे होंगे, जिससे खुदरा महंगाई बढ़ सकती है। विदेश में पढ़ाई या यात्रा महंगी हो जाएगी, और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे मोबाइल और लैपटॉप की कीमतें भी बढ़ सकती हैं।