मंगल पांडे की शहादत: 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत
बैरकपुर में ऐतिहासिक घटना
बैरकपुर : भारतीय इतिहास में 8 अप्रैल का दिन महत्वपूर्ण है। 169 वर्ष पहले, 1857 में, इसी दिन मंगल पांडे को ब्रिटिश शासन द्वारा फांसी दी गई थी। उनकी शहादत ने पूरे देश में विद्रोह की एक नई लहर को जन्म दिया, जो आगे चलकर अंग्रेजों के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन बन गया।
विद्रोह की शुरुआत
मंगल पांडे ईस्ट इंडिया कंपनी की 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के एक सिपाही थे। विद्रोह की शुरुआत तब हुई जब सेना में 'एनफील्ड राइफल' का प्रयोग शुरू हुआ। इन राइफलों के कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी होने की अफवाह ने हिंदू और मुस्लिम दोनों सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को आहत किया। 29 मार्च 1857 को, मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में विद्रोह किया, अपने अंग्रेज अफसरों पर हमला किया और अन्य सैनिकों को भी क्रांति में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। जब ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश की, तो उन्होंने आत्मसमर्पण करने के बजाय खुद को गोली मारने का प्रयास किया, लेकिन वे घायल होकर पकड़े गए।
फांसी की सजा
फांसी की सजा और जल्लादों का इनकार
मंगल पांडे पर कोर्ट मार्शल चलाया गया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। उनकी बहादुरी से स्थानीय जल्लाद इतने डरे हुए थे कि उन्होंने उन्हें फांसी देने से मना कर दिया, जिसके बाद कलकत्ता से चार विशेष जल्लाद बुलाए गए।
जल्दबाजी में फांसी
निर्धारित तिथि से 10 दिन पहले दी गई फांसी
अंग्रेजों को डर था कि मंगल पांडे की उपस्थिति और विद्रोह को भड़का सकती है, इसलिए उन्हें 18 अप्रैल के बजाय 8 अप्रैल 1857 को फांसी दी गई।
1857 की क्रांति का आधार
1857 की क्रांति का आधार
मंगल पांडे की शहादत व्यर्थ नहीं गई। उनकी मृत्यु के एक महीने बाद, 10 मई 1857 को मेरठ में सैनिकों ने विद्रोह किया, जिसे भारत का 'प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' कहा जाता है। 'मारो फिरंगी को' का नारा भी मंगल पांडे की प्रेरणा से ही उभरा, जिसने लाखों भारतीयों को एकजुट किया।
राष्ट्र की श्रद्धांजलि
राष्ट्र कर रहा है नमन
आज देशभर में शहीद मंगल पांडे की प्रतिमाओं पर श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है। उनके जन्मस्थान बलिया से लेकर बैरकपुर तक विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। रक्षा मंत्रालय और विभिन्न राज्य सरकारों ने भी इस महान बलिदानी को श्रद्धांजलि दी है।
