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मकर संक्रांति पर मुर्गा लड़ाई: आंध्र प्रदेश में करोड़पति बने रमेश

मकर संक्रांति के अवसर पर आंध्र प्रदेश के गोदावरी जिले में मुर्गा लड़ाई का आयोजन हुआ, जिसमें रमेश ने 1.53 करोड़ रुपये की बड़ी राशि जीती। यह जीत उनके लिए त्योहार को और भी खास बना गई। हालांकि, इस परंपरा पर कानूनी प्रतिबंध हैं, फिर भी यह ग्रामीण क्षेत्रों में सांस्कृतिक उत्सव का हिस्सा मानी जाती है। जानें इस विवादास्पद परंपरा के बारे में और रमेश की कहानी।
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मकर संक्रांति पर मुर्गा लड़ाई: आंध्र प्रदेश में करोड़पति बने रमेश

मकर संक्रांति का उत्सव

नई दिल्ली: मकर संक्रांति के अवसर पर देशभर में उल्लास का माहौल देखने को मिला। विभिन्न राज्यों में इस त्योहार को अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार मनाया गया। आंध्र प्रदेश के गोदावरी जिले में इस अवसर को और भी खास बनाने के लिए मुर्गा लड़ाई का आयोजन किया गया, जो पूरे जिले में चर्चा का विषय बन गया।


रमेश की बड़ी जीत

राजामुंद्री के निवासी रमेश ने ताडेपल्लीगुडेम में आयोजित मुर्गा लड़ाई में 1.53 करोड़ रुपये की बड़ी राशि जीतकर अपने त्योहार को और भी खास बना दिया। उनकी यह जीत इस सीजन का सबसे बड़ा दांव माना जा रहा है।


प्रभाकर के खिलाफ दांव

रमेश ने गुडीवाड़ा के प्रभाकर के मुर्गे के खिलाफ दांव लगाया था। दोनों मुर्गों के पैरों में चाकू बंधे थे। रमेश का विशेष नस्ल का मुर्गा विजयी रहा, जिससे वह रातों-रात करोड़पति बन गया। रमेश ने खुशी से बताया कि उसने अपने मुर्गे को छह महीने तक सूखे मेवे खिलाकर तैयार किया था, ताकि वह लड़ाई में पूरी ताकत दिखा सके। उनके जश्न के वीडियो स्थानीय टीवी चैनलों पर वायरल हो गए। यह मुकाबला संक्रांति के दूसरे दिन आयोजित किया गया। राज्य के कई जिलों में दो दिनों से बड़े पैमाने पर मुर्गा लड़ाइयां हो रही हैं, जहां लाखों-करोड़ों का सट्टा लग रहा है। हालांकि, कानूनी रूप से इस तरह की प्रतियोगिताओं पर प्रतिबंध है, लेकिन त्योहार के दौरान अक्सर ऐसे आयोजन होते हैं।


कानूनी प्रतिबंध और परंपरा

मुर्गा लड़ाई और इससे जुड़ा जुआ पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 और आंध्र प्रदेश गेमिंग एक्ट के तहत आता है, जिसके कारण इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। जानवरों के अधिकार संगठन इसे क्रूरता का मामला मानते हैं, क्योंकि मुर्गों के पैरों में चाकू बांधना और लड़ाई कराना गैरकानूनी है। कुछ आयोजक दावा करते हैं कि यह केवल परंपरा है और सट्टेबाजी नहीं होती, लेकिन वास्तविकता में भारी जुआ चलता है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई फैसलों के बावजूद यह प्रथा संक्रांति पर जोर-शोर से जारी रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे सांस्कृतिक उत्सव का हिस्सा माना जाता है। वहीं, असम में भैंसों की लड़ाई भी आयोजित की जाती है, जो माघ बिहू उत्सव के दौरान होती है। लोग इसे अपनी परंपरा से जोड़ते हैं।