मणिपुर में बढ़ती अराजकता: राष्ट्रीय चिंता का अभाव
मणिपुर के हालात पर चिंता का अभाव
मणिपुर में स्थिति बेहद चिंताजनक है, लेकिन इस पर राष्ट्रीय स्तर पर कोई गंभीर चिंता नहीं दिखाई दे रही है। राज्य में पहले से ही सामाजिक विघटन की स्थिति बनी हुई है, जिसके चलते राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे पर भी भारी दबाव पड़ रहा है।
राज्य में अराजकता के हालात बनते जा रहे हैं। रात के कर्फ्यू के बावजूद हजारों लोग रोजाना मशाल जुलूस निकाल रहे हैं और जगह-जगह हिंसा की घटनाएं हो रही हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कानून-व्यवस्था की प्रणाली पूरी तरह से विफल हो चुकी है। 7 अप्रैल को हुए एक बम विस्फोट में दो मैतेई बच्चों की मौत के बाद से स्थिति और बिगड़ गई है। इस बीच, कुकी और नगा समुदायों के बीच हिंसक टकराव की एक नई परत जुड़ गई है। पिछले तीन वर्षों से राज्य में मुख्य संघर्ष मैतेई और कुकी समुदायों के बीच था, लेकिन हाल ही में नगा और कुकी समुदायों के बीच भी टकराव देखने को मिला।
18 अप्रैल को एक राजमार्ग पर दो यात्रियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके विरोध में नगा समुदाय ने तीन दिन का बंद रखा, जिसके जवाब में कुकी समुदाय ने भी विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान दोनों समुदायों के बीच कई स्थानों पर पथराव और आगजनी की घटनाएं हुईं। इसी बीच, मैतेई समुदाय के लोग मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह के एक कार्यक्रम में घुसने का प्रयास कर रहे थे, जिसके चलते पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी, जिसमें एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया। मैतेई समुदाय के संगठनों ने आरोप लगाया है कि कर्फ्यू लागू करने के प्रयास में सुरक्षा बलों ने भय का माहौल बना रखा है। ऐसी घटनाएं रोजाना हो रही हैं, लेकिन देश के बाकी हिस्सों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।
मणिपुर की स्थिति पर किसी भी हलके में चिंता का कोई संकेत नहीं है। पहले से ही सामाजिक विघटन की स्थिति बनी हुई है, जिसके चलते राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे पर भी गहरा दबाव है। अशांति के प्रारंभिक दिनों में बहुसंख्यक मैतेई समुदाय राज्य सरकार के समर्थन में था, लेकिन हाल के बयानों और घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि अब यह समुदाय भी निराशा की स्थिति में है, जिसका संकेत वे कानून-व्यवस्था के उपायों को चुनौती देकर दे रहे हैं। इन हालात को नजरअंदाज करना राष्ट्रीय अखंडता के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
