मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: तीसरी गर्भावस्था पर भी मातृत्व अवकाश का पूरा लाभ
महिलाओं के अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण निर्णय
नई दिल्ली। महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के संदर्भ में मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि तीसरी गर्भावस्था के मामले में मातृत्व अवकाश देने में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया गया है कि महिला कर्मचारियों को पहली और दूसरी गर्भावस्था की तरह ही तीसरी गर्भावस्था पर भी पूरा मातृत्व लाभ प्रदान किया जाए।
सरकारी आदेश पर सवाल उठाते हुए
न्यायमूर्ति आर. सुरेश कुमार और न्यायमूर्ति एन. सेंथिल कुमार की खंडपीठ ने 13 मार्च 2026 को जारी सरकारी आदेश पर सवाल उठाया, जिसमें तीसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश को केवल 12 सप्ताह तक सीमित किया गया था। अदालत ने इसे न केवल अनुचित बल्कि महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण भी माना।
याचिका पर सुनवाई
यह निर्णय शाइयी निशा की याचिका पर आधारित है, जिन्होंने 2 फरवरी 2026 से 1 फरवरी 2027 तक मातृत्व अवकाश की मांग की थी। पहले जिला न्यायाधीश और मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने उनकी मांग को खारिज कर दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने इन आदेशों को रद्द करते हुए एक सप्ताह के भीतर उनका आवेदन मंजूर करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि चाहे गर्भावस्था की संख्या कोई भी हो, महिलाओं को समान शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का संदर्भ
खंडपीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों और अपने ही न्यायालय के फैसलों के अनुसार मातृत्व लाभ में इस प्रकार की पाबंदी को सही नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि कार्यपालिका अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए ऐसा आदेश नहीं दे सकती, जो स्थापित कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ हो।
कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि तमिलनाडु सरकार खुद को एक कल्याणकारी राज्य के रूप में प्रस्तुत करती है और महिलाओं के उत्थान के लिए कई योजनाएं चला रही है। ऐसे में मातृत्व अवकाश को सीमित करना सरकार की नीतियों के अनुरूप नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी आदेश न्यायालयों के निर्णयों और स्थापित कानून से ऊपर नहीं हो सकते। इसलिए 12 सप्ताह की सीमा तय करने का कोई ठोस आधार नहीं है और इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।
