Newzfatafatlogo

मद्रास हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी के दुष्कर्म मामले में फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला

मद्रास हाईकोर्ट ने एक संवेदनशील मामले में नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म करने वाले आरोपी की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। अदालत ने कहा कि उम्रकैद अपराधी को उसके अपराध का सामना करने के लिए मजबूर करती है, जबकि फांसी एक अंतिम दंड है। इस फैसले में अदालत ने कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया, जिसमें आरोपी के सुधार की संभावना और मामले की गंभीरता शामिल हैं। जानें इस निर्णय के पीछे की पूरी कहानी और अदालत की टिप्पणियाँ।
 | 
मद्रास हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी के दुष्कर्म मामले में फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला

महत्वपूर्ण निर्णय

नई दिल्ली - मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ ने एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए नाबालिग बेटी के साथ बार-बार दुष्कर्म करने वाले आरोपी की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। अदालत ने कहा कि अपराधी को उसके अपराध का सामना करने के लिए जीवनभर जीने देना, मृत्युदंड से अधिक कठोर सजा हो सकती है।


सजा पर अदालत की टिप्पणी

खंडपीठ के जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन ने सजा के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि फांसी एक अंतिम दंड है, जो न केवल अपराधी के जीवन को समाप्त करता है, बल्कि उसके पश्चाताप और सुधार की संभावनाओं को भी खत्म कर देता है। इसके विपरीत, उम्रकैद उसे हर दिन अपने अपराध का सामना करने के लिए मजबूर करती है।


उम्रकैद की शर्तें

उम्रकैद की सख्त शर्तें
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषी को दी गई उम्रकैद उसके जीवन के अंत तक लागू रहेगी। उसे किसी भी प्रकार की समयपूर्व रिहाई या माफी का लाभ नहीं मिलेगा और उसे जीवनभर जेल में रहना होगा।


मामले का विवरण

क्या था मामला?
यह मामला तब सामने आया जब एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर अपनी 14 वर्षीय बेटी का यौन शोषण किया। पीड़िता ने अदालत को बताया कि उसके साथ 20 से अधिक बार दुष्कर्म किया गया। यह घटना तब उजागर हुई जब मां ने बेटी की शारीरिक स्थिति में बदलाव देखा और उसे डॉक्टर के पास ले गई।


मेडिकल जांच और कानूनी प्रक्रिया

मेडिकल जांच में पता चला कि पीड़िता लगभग पांच महीने की गर्भवती थी। कानूनी प्रक्रिया के तहत उसका सुरक्षित गर्भपात कराया गया। डीएनए जांच से यह पुष्टि हुई कि आरोपी ही भ्रूण का जैविक पिता था।


निचली अदालत का फैसला

निचली अदालत ने सुनाई थी फांसी
पोक्सो कोर्ट ने 5 जनवरी 2026 को आरोपी को ‘गंभीर प्रवेशन यौन हमले’ का दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट ने इसे पिता द्वारा किया गया ‘भरोसे का घोर उल्लंघन’ बताया था।


हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने क्यों बदली सजा?
हाईकोर्ट ने सजा कम करने के पीछे कई महत्वपूर्ण आधार बताए। अदालत ने कहा कि यह अपराध गंभीर है, लेकिन इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में रखने के लिए आवश्यक अतिरिक्त क्रूरता के ठोस प्रमाण नहीं मिले।


अंतिम निर्णय

कोर्ट ने यह भी कहा कि निचली अदालत का फैसला संभवतः मामले की भयावहता से प्रभावित था। हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा को मृत्युदंड से घटाकर कठोर उम्रकैद में बदल दिया है।