मेलोडी टॉफी: बचपन की यादों का स्वाद और पीएम मोदी का खास तोहफा
मेलोडी टॉफी की लोकप्रियता का सफर
नई दिल्ली। मेलोडी टॉफी अब केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि यह कई लोगों के बचपन की यादों का हिस्सा बन चुकी है। इसकी बाहरी परत कारमेल और अंदर की चॉकलेट ने इसे दशकों से लोगों का प्रिय बना रखा है। हाल ही में, पीएम मोदी का इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को मेलोडी चॉकलेट भेंट करते हुए एक वीडियो वायरल हुआ है। आइए जानते हैं कि मेलोडी ने इतनी लोकप्रियता कैसे हासिल की और यह भारतीयों के दिलों में कब से बसी हुई है। 1980 के दशक में, टॉफी और कैंडी का बाजार तेजी से बढ़ रहा था। उस समय कैडबरी की 'एक्लेयर्स' काफी चर्चित थी। इसी बीच पार्ले ने मेलोडी टॉफी का लॉन्च किया। इसका कॉन्सेप्ट भी कुछ हद तक समान था, लेकिन पार्ले इसे एक अलग पहचान देना चाहता था।
एक लाइन ने बदल दी मेलोडी की किस्मत
पार्ले ने अपनी विज्ञापन एजेंसी 'एवरेस्ट' को यह जिम्मेदारी दी कि वह मेलोडी को अन्य टॉफियों से अलग कैसे प्रस्तुत करें। इसी दौरान एक प्रसिद्ध लाइन का जन्म हुआ, जो आज भी लोगों की जुबान पर है - 'मेलोडी इतनी चॉकलेटी कैसे है?' और इसका जवाब था - 'मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ!' इस एक लाइन ने मेलोडी की किस्मत बदल दी। इस टैगलाइन को कॉपीराइटर सुलेखा बाजपेयी ने लिखा था। 'मेलोडी है चॉकलेटी' वाला जिंगल भी लोगों के दिलों में बस गया। पार्ले का उद्देश्य लोगों में जिज्ञासा उत्पन्न करना था, और यही रणनीति सफल रही। मेलोडी बच्चों से लेकर युवाओं तक की पसंद बन गई।
हर जगह गूंजा सवाल
मेलोडी के टीवी विज्ञापन भी बेहद लोकप्रिय हुए। किसी विज्ञापन में कोच पूछता था कि 'मेलोडी इतनी चॉकलेटी कैसे है?' तो कहीं शिक्षक यही सवाल करती नजर आती थीं। हर बार जवाब एक ही होता था - 'मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ!' इन विज्ञापनों ने मेलोडी को केवल एक टॉफी नहीं, बल्कि पॉप कल्चर का हिस्सा बना दिया।
फिल्मों और मीम्स में मेलोडी की मौजूदगी
सालों बाद भी यह लाइन खत्म नहीं हुई। 2019 में फिल्म 'छिछोरे' में भी इसी डायलॉग का मजेदार अंदाज में उपयोग किया गया। सोशल मीडिया पर भी यह लाइन मीम्स के जरिए लगातार वायरल होती रहती है। 40 साल बाद भी सवाल वही है - 'मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?' और जवाब भी वही है - 'मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ!'
