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मोहन भागवत ने भारत की पहचान और हिंदू समाज की भूमिका पर विचार साझा किए

मोहन भागवत ने हाल ही में भारत की पहचान और हिंदू समाज की भूमिका पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत संस्कृति है। भागवत ने हिंदू समाज की समावेशिता और उसके मूल्यों की रक्षा की बात की, साथ ही वैश्विक अपेक्षाओं पर भी प्रकाश डाला। उनके विचारों ने सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय चरित्र पर नई बहस को जन्म दिया है।
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मोहन भागवत ने भारत की पहचान और हिंदू समाज की भूमिका पर विचार साझा किए

भारत की पहचान और हिंदू समाज की जिम्मेदारी


नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को भारत की पहचान, हिंदू समाज की भूमिका और देश के चरित्र पर महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत संस्कृति और विचारधारा का प्रतीक है। भागवत के अनुसार, देश में होने वाली घटनाओं की जिम्मेदारी हिंदू समाज पर आती है, जिससे सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय चरित्र पर नई चर्चा शुरू हुई है।


अपने संबोधन में भागवत ने यह स्पष्ट किया कि भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में देखना गलत है। उनके अनुसार, भारत का असली परिचय उसके विचार, परंपराएं और जीवन मूल्य हैं। जब भी देश में कुछ अच्छा या बुरा होता है, तो दुनिया हिंदू समाज से सवाल करती है, क्योंकि भारत की आत्मा हिंदू परंपरा में निहित है। यह जिम्मेदारी किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है।


हिंदू समाज की समावेशिता

हिंदू समाज की समावेशी परंपरा


भागवत ने कहा कि हिंदू समाज की सबसे बड़ी ताकत उसकी समावेशिता है। यहां पूजा-पद्धति, पहनावा, खान-पान, भाषा, जाति और उपजाति में विविधता होने के बावजूद टकराव की भावना नहीं रही। उन्होंने कहा कि यही स्वीकार्यता हिंदू समाज की पहचान है, जिसने सदियों से विभिन्न विचारों को स्थान दिया है। इस विविधता के बावजूद समाज को एक सूत्र में बांधे रखने की परंपरा आज भी जीवित है।


मूल्यों की रक्षा

आक्रमणों के बावजूद मूल्यों की रक्षा


आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत ने इतिहास में कई आक्रमण, विनाश और कठिन दौर देखे हैं। इसके बावजूद समाज ने अपने मूल्यों और धर्म को समाप्त नहीं होने दिया। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने इन मूल विचारों को बचाए रखा, वही हिंदू कहलाए। ऐसे लोगों की भूमि को भारत कहा गया। यह निरंतरता इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज की जड़ें कितनी मजबूत हैं।


वैश्विक अपेक्षाएं

देश का चरित्र और वैश्विक अपेक्षाएं


भागवत ने कहा कि अगर देश के लोग अच्छे, दृढ़ और ईमानदार बनने का प्रयास करें, तो वही गुण भारत की वैश्विक छवि में भी दिखाई देंगे। दुनिया आज भारत से बहुत कुछ उम्मीद करती है। भारत तभी सार्थक योगदान दे सकता है, जब उसके पास पर्याप्त शक्ति और प्रभाव हो। यह शक्ति केवल भौतिक नहीं, बल्कि नैतिक और बौद्धिक भी होनी चाहिए।


शक्ति और नैतिक बल

शक्ति, मूल्य और नैतिक बल


अपने वक्तव्य में उन्होंने स्पष्ट किया कि शक्ति का मतलब केवल सैन्य ताकत नहीं है। शक्ति में बुद्धि, सिद्धांत और नैतिक मूल्य भी शामिल हैं। भागवत ने कहा कि नैतिक मूल्यों को तब व्यापक स्वीकृति मिलती है, जब वे ताकत के साथ खड़े हों। अगर भारत अपने मूल्यों के साथ मजबूत बना रहे, तो उसकी बात दुनिया गंभीरता से सुनेगी। यही भारत के चरित्र की असली पहचान है।