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यूरोपियन यूनियन और पाकिस्तान का विवादास्पद बयान: भारत की प्रतिक्रिया

यूरोपियन यूनियन और पाकिस्तान के साझा बयान में भारत के दृष्टिकोण से कई आपत्तिजनक बातें शामिल हैं। यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में कश्मीर का उल्लेख और इसे अनसुलझा मुद्दा बताना भारत के लिए स्पष्ट विरोधाभासी रुख दर्शाता है। इस लेख में, हम इस विवादास्पद बयान पर भारत की प्रतिक्रिया और विदेश नीति की चुनौतियों पर चर्चा करेंगे। क्या यह भारतीय विदेश नीति की कमजोरी को उजागर करता है? जानें पूरी कहानी में।
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यूरोपियन यूनियन और पाकिस्तान का विवादास्पद बयान: भारत की प्रतिक्रिया

भारत के दृष्टिकोण से आपत्तिजनक बयान


यूरोपियन यूनियन और पाकिस्तान के संयुक्त बयान में भारत के लिए कई आपत्तिजनक बातें शामिल हैं। यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में कश्मीर का उल्लेख और इसे अनसुलझा मुद्दा बताना भारत के प्रति स्पष्ट विरोधाभासी रुख दर्शाता है।


पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की हालिया चीन यात्रा के दौरान जारी बयान में जम्मू-कश्मीर का उल्लेख किया गया। चीन ने इसे 'इतिहास से उत्पन्न विवाद' कहा। दोनों पक्षों ने इस मुद्दे के 'शांतिपूर्ण और उचित समाधान' की आवश्यकता पर जोर दिया। संयुक्त बयान में कहा गया कि समाधान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और द्विपक्षीय समझौतों के अनुरूप होना चाहिए। यह बयान भारत के लिए स्पष्ट रूप से विरोधाभासी था, और भारत सरकार ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की।


हालांकि, यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने पाकिस्तान के साथ अपने साझा बयान में जो कहा है, वह चीन की टिप्पणियों से भी आगे बढ़ता प्रतीत होता है। ईयू की विदेश नीति प्रमुख काया काल्लास की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान कहा गया कि 'पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर मुद्दे की जानकारी दी। ईयू ने यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध की जानकारी दी। दोनों पक्षों ने इन टकरावों का संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के अनुरूप बातचीत एवं कूटनीति से शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया।' इस कथन में कई आपत्तिजनक बातें हैं।


यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में कश्मीर का उल्लेख और इसे अनसुलझा मुद्दा बताना सीधे तौर पर भारत के खिलाफ है। यहां तक कि चीन ने भी भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय समझौतों का उल्लेख किया था, जबकि ईयू ने उनकी अनदेखी की।


एक अलग टिप्पणी में काल्लास ने पाकिस्तान को 'महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय शक्ति' बताया। पिछले कई दशकों से भारतीय विदेश नीति का एक प्रमुख उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के संरक्षक पाकिस्तान को अलग-थलग करना रहा है। 2008 के मुंबई हमलों के बाद इस दिशा में कई महत्वपूर्ण सफलताएँ भी मिली थीं। लेकिन अब पाकिस्तान को क्यों महत्व और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता मिल रही है, यह एक कठिन प्रश्न है। चीन और 57 सदस्यों वाले इस्लामिक सहयोग संगठन का समर्थन तो हमेशा पाकिस्तान के साथ रहा है, लेकिन यदि ईयू और अमेरिका के डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने भी उसे महत्व दिया, तो क्या इसे भारतीय विदेश नीति की कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाएगा?