वट सावित्री व्रत: पति की लंबी उम्र के लिए महिलाओं की आस्था का पर्व
वट सावित्री व्रत का महत्व
चंडीगढ़, 15 मई। उत्तर भारत समेत पूरे देश में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है, जो सुहागिन महिलाओं के लिए आस्था का प्रतीक है। यह पर्व हर साल ज्येष्ठ मास में मनाया जाता है, जब विवाहित महिलाएं अपने पतियों की लंबी उम्र और सुखद दांपत्य जीवन के लिए उपवास रखती हैं। हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली-NCR में महिलाएं इस दिन पारंपरिक परिधानों में सजकर बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह दांपत्य जीवन में प्रेम, निष्ठा और विश्वास का प्रतीक भी है।
माता सावित्री और यमराज की कथा
यमराज से पति के प्राण वापस लाई थीं माता सावित्री
इस व्रत का संबंध पौराणिक काल की माता सावित्री से है, जिन्हें भारतीय संस्कृति में आदर्श पत्नी माना जाता है। सावित्री, जो मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री थीं, ने सत्यवान को पति के रूप में चुना, भले ही देवर्षि नारद ने उन्हें चेतावनी दी थी कि सत्यवान की आयु कम है।
सावित्री की चतुराई
बुद्धिमानी और चतुराई से जीता यमराज का दिल
विवाह के बाद, जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काटते समय बेहोश हो गए, यमराज उनके प्राण लेने आए। सावित्री ने बिना डर के यमराज का पीछा किया और अपनी बुद्धिमत्ता से उन्हें प्रभावित किया। यमराज ने उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा, लेकिन यह शर्त रखी कि वह पति के प्राण नहीं मांग सकतीं।
सत्यवान को जीवन का वरदान
ऐसे मिला सत्यवान को दोबारा जीवन
सावित्री ने यमराज से अपने सास-ससुर के राज्य की वापसी, आंखों की रोशनी और अंत में सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान मांगा। यमराज ने 'तथास्तु' कह दिया, लेकिन यह जानते हुए कि एक पतिव्रता नारी पति के बिना माता नहीं बन सकती। इस प्रकार यमराज ने सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिए।
बरगद के पेड़ की पूजा का महत्व
बरगद के पेड़ की पूजा का वैज्ञानिक और धार्मिक रहस्य
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जहां सत्यवान को जीवन मिला, वहां एक विशाल बरगद का वृक्ष था। इसी कारण इस उपवास का नाम 'वट सावित्री व्रत' पड़ा। महिलाएं इस दिन बरगद के तने पर सूत का धागा लपेटकर अपने पति की दीर्घायु की मन्नत मांगती हैं।
