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विक्रम संवत: हिंदू नववर्ष की शुरुआत और इसका ऐतिहासिक महत्व

विक्रम संवत, जो हिंदू नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है, 19 मार्च को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष से शुरू होगा। यह संवत उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा स्थापित किया गया था, जिन्होंने शकों को पराजित कर उनके शासन का अंत किया। जानें इस संवत का ऐतिहासिक महत्व और इसके पीछे की पौराणिक मान्यताएं।
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विक्रम संवत: हिंदू नववर्ष की शुरुआत और इसका ऐतिहासिक महत्व

हिंदू नववर्ष का आगाज़


चैत्र मास में हिंदू नववर्ष की शुरुआत होती है। इस वर्ष, 19 मार्च को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से विक्रम संवत 2083 का आगाज़ होगा। यह रौद्र संवत्सर होगा, जिसमें देवताओं के गुरु बृहस्पति और ग्रहों के सेनापति मंगल की भूमिका होगी।


संवत्सर का अर्थ पूरे वर्ष से है, जो 12 महीनों का एक विशेष काल है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन की थी। विक्रम संवत से पहले युधिष्ठिर, कलियुग और सप्तर्षि संवत प्रचलित थे, लेकिन विक्रम संवत में तिथियों और नक्षत्रों की स्पष्ट जानकारी थी।


विक्रम संवत का इतिहास और शक शासन

उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की स्थापना की थी। उनके शासनकाल में भारत के एक बड़े हिस्से पर शकों का राज था, जो विदेशी शासक थे और प्रजा के साथ अत्याचार करते थे। विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर उनके शासन का अंत किया।


यह संवत इस विजय की स्मृति में स्थापित किया गया। विक्रमादित्य ने 57 ईसा पूर्व विक्रम संवत की शुरुआत की थी। यह पंचांग भारत में मान्यता प्राप्त है और इसके आधार पर हिंदू धर्म के त्योहार और तिथियां निर्धारित की जाती हैं। विक्रम संवत अंग्रेजी कैलेंडर से 57 वर्ष आगे है।