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विश्व सामाजिक न्याय दिवस: समानता और अवसर का वैश्विक आह्वान

विश्व सामाजिक न्याय दिवस, जो हर साल 20 फरवरी को मनाया जाता है, समाज में समानता और अवसर की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यह दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित किया गया है और इसका उद्देश्य गरीबी, बेरोजगारी और असमानता जैसी समस्याओं का समाधान करना है। 2026 में इस दिवस की थीम 'सामाजिक विकास और सामाजिक न्याय के प्रति नवीकृत प्रतिबद्धता' होगी। जानें इस दिवस का महत्व और भारत में इसके कार्यान्वयन के प्रयासों के बारे में।
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विश्व सामाजिक न्याय दिवस: समानता और अवसर का वैश्विक आह्वान

विश्व सामाजिक न्याय दिवस का महत्व

नई दिल्ली: 'विश्व सामाजिक न्याय दिवस' का उद्देश्य समाज में एकता, सद्भाव और समान अवसरों को बढ़ावा देना है, साथ ही गरीबी, बहिष्कार, बेरोजगारी और असमानता जैसी समस्याओं का समाधान करना है। यह दिवस हर साल 20 फरवरी को मनाया जाता है और इसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित किया गया था। इसका आरंभ इस विचार के साथ हुआ कि सामाजिक न्याय और विकास पर ध्यान केंद्रित करने से देशों के बीच शांति, सुरक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा की जा सके। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 26 नवंबर 2007 को इस दिवस की घोषणा की थी। भारत में, यह दिवस 2009 से मनाया जा रहा है।


सामाजिक न्याय की आवश्यकता

यह दिन वैश्विक चुनौतियों जैसे वित्तीय संकट, असुरक्षा और बढ़ती असमानता के बीच सामाजिक न्याय पहलों की आवश्यकता को रेखांकित करता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की 2008 की घोषणा 'निष्पक्ष वैश्वीकरण के लिए सामाजिक न्याय' भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जो समान अवसर और सामाजिक सुरक्षा पर जोर देती है।


2026 की थीम

2026 में यह दिवस 'सामाजिक विकास और सामाजिक न्याय के प्रति नवीकृत प्रतिबद्धता' के थीम के साथ मनाया जाएगा। यह थीम दोहा में हुए दूसरे विश्व सामाजिक विकास शिखर सम्मेलन के बाद आई है, जिसमें सदस्य देशों ने गरीबी उन्मूलन, उत्पादक रोजगार, सभ्य काम और सामाजिक समावेशन को सामाजिक विकास के मुख्य स्तंभ के रूप में स्वीकार किया है।


भारत में सामाजिक न्याय का आधार

भारत में, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय (MOSJE) विधायी सुधारों और वैश्विक साझेदारी के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक अंतर को पाटने में सक्रिय है। भारतीय संविधान सामाजिक न्याय का एक मजबूत आधार प्रदान करता है।


संविधान में सामाजिक न्याय के प्रावधान

संविधान के अनुच्छेद 23 में मानव तस्करी और जबरन मजदूरी पर रोक लगाई गई है, जबकि अनुच्छेद 24 बाल श्रम पर प्रतिबंध लगाता है। अनुच्छेद 38 असमानताओं को कम करने, अनुच्छेद 39 समान आजीविका और उचित मजदूरी, अनुच्छेद 39A मुफ्त कानूनी सहायता और अनुच्छेद 46 एससी/एसटी तथा कमजोर वर्गों के लिए विशेष प्रोत्साहन का प्रावधान करता है।


समावेशी समाज की दिशा में प्रयास

मंत्रालय का उद्देश्य एक समावेशी समाज बनाना है, जहां हाशिए पर पड़े समुदाय सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकें। इसके लिए शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रमों के साथ पुनर्वास पहलों का संचालन किया जा रहा है। भारत सरकार का प्रयास है कि गरीब और पिछड़े लोग भी सम्मान के साथ जीवन यापन कर सकें।


मंत्रालय का इतिहास

1985-86 में भारत सरकार ने कल्याण मंत्रालय को दो भागों में विभाजित किया, जिसमें एक महिला एवं बाल विकास विभाग और दूसरा कल्याण विभाग शामिल था। बाद में, मई 1998 में इस मंत्रालय का नाम बदलकर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय कर दिया गया।