संत तुलसीदास और हनुमान जी की अद्भुत भेंट
हनुमान जी का दर्शन
संत तुलसीदास ने 16वीं शताब्दी में अवधी भाषा में 'रामचरितमानस' की रचना की, जो अयोध्या में शुरू हुई थी। कहा जाता है कि उन्हें हनुमान जी और प्रभु श्रीराम के दर्शन हुए। वाराणसी में एक बार संत तुलसीदास की हनुमान जी से एक विशेष भेंट हुई।
प्रेत के माध्यम से मुलाकात
पौराणिक कथाओं के अनुसार, तुलसीदास जी की हनुमान जी से मुलाकात एक प्रेत के माध्यम से हुई, जिसने उन्हें हनुमान जी का पता बताने का वादा किया था।
कोढ़ी के रूप में पहचान
काशी में कथा के दौरान, तुलसीदास जी ने हनुमान जी को कोढ़ी के रूप में पहचाना और उनके चरण पकड़ लिए। इसके बाद हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिए और चित्रकूट में राम जी से मिलने का मार्ग बताया।
मुलाकात की कहानी
प्रेत ने बताया पता
तुलसीदास जी ने एक बूढ़े कोढ़ी व्यक्ति को हमेशा कथा में सबसे पहले और सबसे अंत में आते हुए देखा। एक प्रेत ने उन्हें बताया कि यही कोढ़ी हनुमान जी हैं।
जंगल में उनके चरण पकड़
एक दिन, कथा के बाद, तुलसीदास जी ने उस वृद्ध का पीछा किया और जंगल में उनके चरण पकड़ लिए। जब कोढ़ी ने बचने की कोशिश की, तो तुलसीदास जी ने कहा कि वे उन्हें पहचान चुके हैं।
महाबली हनुमान जी ने तुलसीदास जी के समर्पण को देखकर अपना असली रूप प्रकट किया।
श्रीराम दर्शन का वरदान
हनुमान जी ने तुलसीदास जी से वरदान मांगने को कहा, जिस पर उन्होंने प्रभु राम के दर्शन की इच्छा जताई। हनुमान जी ने उन्हें चित्रकूट जाने की सलाह दी, जहाँ उन्हें राम जी के दर्शन हुए।
यह स्थान आज वाराणसी में संकट मोचन मंदिर के रूप में जाना जाता है। हनुमान जी, तुलसीदास के भगवान राम के प्रति प्रेम से प्रभावित होकर, अंततः अपने असली रूप में प्रकट हुए और उन्हें चित्रकूट जाने का निर्देश दिया।
