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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: वेश्यावृत्ति में शामिल महिलाओं की सहमति का महत्व

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि वेश्यावृत्ति में शामिल सभी महिलाएं मजबूरी का शिकार नहीं होतीं। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला अपनी इच्छा से इस पेशे में है, तो उसे पुनर्वास केंद्र में भेजना गलत होगा। इस फैसले में महिलाओं की इच्छाओं और स्वतंत्रता का सम्मान करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। जानें इस ऐतिहासिक फैसले के प्रमुख बिंदु और इसके सामाजिक प्रभाव।
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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: वेश्यावृत्ति में शामिल महिलाओं की सहमति का महत्व

महिलाओं की स्वेच्छा का सम्मान


नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यह धारणा गलत है कि वेश्यावृत्ति में शामिल सभी महिलाएं मजबूरी का शिकार हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी महिलाओं को पुनर्वास केंद्र में भेजना उचित नहीं है। अदालत ने पाया कि कई महिलाएं अपनी इच्छा से इस पेशे को अपनाती हैं। यदि कोई महिला वयस्क है, तो उसकी सहमति के बिना उसे पुनर्वास केंद्र में भेजना गलत होगा।


प्रज्वला बनाम भारत संघ मामला

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने प्रज्वला बनाम भारत संघ मामले में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। इस मामले में वेश्यावृत्ति से बचाई गई महिलाओं के लिए पुनर्वास व्यवस्था में सुधार की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार ने इस उद्देश्य के लिए बनाई गई योजनाओं और विभिन्न राज्यों द्वारा किए गए प्रयासों की जानकारी दी, जिस पर कोर्ट ने संतोष व्यक्त किया।


कोर्ट का दृष्टिकोण

अदालत ने कहा कि अनैतिक व्यापार अधिनियम 1956 की धारा 17 हर महिला 'यौनकर्मी' को एक समान मानती है। यह कानून उन महिलाओं के बीच भेदभाव नहीं कर पाता जो मजबूरी में इस धंधे में हैं और जो अपनी इच्छा से इसे अपनाती हैं।


इस समानता की सोच का परिणाम यह होता है कि जब ऐसी महिलाएं मजिस्ट्रेट के सामने पेश होती हैं, तो उनकी वास्तविकता को नजरअंदाज कर दिया जाता है।


महिलाओं की इच्छाओं का महत्व

फैसले में यह भी कहा गया कि यह मामला किसी महिला के जीवन, स्वतंत्रता और भविष्य से गहराई से जुड़ा है। इसलिए, इस संदर्भ में कोई भी निर्णय लेते समय उनकी इच्छाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मजिस्ट्रेट को महिला की पसंद जानने का प्रयास करना चाहिए। यदि कोई महिला अपनी मर्जी से वेश्यावृत्ति में है और पुनर्वास केंद्र में नहीं जाना चाहती, तो उसे जाने की अनुमति दी जानी चाहिए।


बेंच ने यह स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट को पूछताछ करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि महिला जो भी कह रही है, वह अपनी इच्छा से कह रही है और उसके बयान पर कोई दबाव नहीं है। यदि मजिस्ट्रेट इस बात से संतुष्ट होते हैं कि महिला स्वेच्छा से बयान दे रही है और यौन कार्य में भी अपनी मर्जी से लगी हुई है, तो उसे पुनर्वास केंद्र में नहीं भेजा जाना चाहिए।