सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कामकाजी महिलाओं के लिए पीरियड्स पर अनिवार्य छुट्टी की याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए मासिक धर्म के दौरान अनिवार्य छुट्टी की मांग करने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि यह एक नीतिगत मामला है, इसलिए याचिकाकर्ता को सरकार से संपर्क करना चाहिए। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए महिलाओं के रोजगार और अधिकारों से संबंधित कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
याचिका का विवरण
यह याचिका वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने कहा कि मातृत्व अवकाश की तरह मासिक धर्म के दौरान भी छुट्टी मिलनी चाहिए। उन्होंने सभी राज्यों को इस पर कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की थी। कुछ निजी कंपनियां और केरल सरकार पहले से ही ऐसी छुट्टी दे रही हैं, लेकिन याचिकाकर्ता चाहते थे कि इसे पूरे देश में अनिवार्य किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
- महिलाओं की छवि पर प्रभाव: अदालत ने कहा कि ऐसी याचिकाएं महिलाओं को कमजोर दिखा सकती हैं, जिससे यह धारणा बन सकती है कि मासिक धर्म एक नकारात्मक प्रक्रिया है।
- गलत धारणाएं: पीठ ने कहा कि ये मांगें समाज में यह धारणा बना सकती हैं कि मासिक धर्म के कारण महिलाएं सामान्य कार्य नहीं कर सकतीं।
- नौकरियों पर असर: मुख्य न्यायाधीश ने चिंता जताई कि यदि इसे अनिवार्य किया गया तो कंपनियां महिलाओं को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करने से कतराएंगी। इससे उनके करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- नियोक्ता की चिंताएं: अदालत ने स्पष्ट किया कि अनिवार्य छुट्टी के नियम से नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से हिचकिचाएंगे।
- सरकार को सुझाव: कोर्ट ने केंद्र सरकार को सलाह दी कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय सभी हितधारकों से चर्चा करके इस विषय पर उचित नीति बनाने पर विचार करे।
