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सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: पेंशन और कार्यरत कर्मचारियों के लिए समान महंगाई भत्ता

सुप्रीम कोर्ट ने कार्यरत कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए महंगाई भत्ते में भेदभाव को अस्वीकार करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि दोनों का उद्देश्य समान है, और इस प्रकार का भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। यह मामला 2021 के एक सरकारी आदेश से जुड़ा है, जिसमें कार्यरत कर्मचारियों के लिए डीए में वृद्धि की गई थी, जबकि पेंशनभोगियों के लिए कम वृद्धि की गई थी। जानें इस फैसले के पीछे की पूरी कहानी।
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सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: पेंशन और कार्यरत कर्मचारियों के लिए समान महंगाई भत्ता

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिसमें कार्यरत कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए महंगाई भत्ते (DA-DR Hike) के संबंध में भेदभाव को अस्वीकार किया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कार्यरत कर्मचारियों को अधिक महंगाई भत्ता और पेंशनभोगियों को कम महंगाई राहत देना अनुचित है, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन है।


कोर्ट की टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस मनोज मिश्रा और प्रसन्ना बी वराले शामिल थे, ने केरल सरकार और केरल राज्य सड़क परिवहन निगम की अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें डीए और डीआर की अलग-अलग दरों को असंवैधानिक करार दिया गया था।


महंगाई के आधार पर डीआर का निर्धारण

कोर्ट ने कहा कि जब पेंशन पर महंगाई के आधार पर डीआर निर्धारित किया जाता है, तो कार्यरत कर्मचारियों के लिए डीए से कम दर पर डीआर तय करना भेदभावपूर्ण है। दोनों का उद्देश्य समान है, इसलिए इस प्रकार का भेदभाव अस्वीकार्य है।


मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 2021 के एक सरकारी आदेश से संबंधित है, जिसमें कार्यरत कर्मचारियों के लिए डीए में 14 प्रतिशत की वृद्धि की गई थी, जबकि पेंशनभोगियों के लिए केवल 11 प्रतिशत की वृद्धि की गई थी। दोनों वृद्धि एक ही महंगाई सूचकांक से जुड़ी थीं। पहले केरल हाई कोर्ट के एकल जज ने इसे सही ठहराया था, लेकिन डिवीजन बेंच ने इसे भेदभावपूर्ण मानते हुए रद्द कर दिया। इसके बाद केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि वित्तीय बोझ के कारण अलग दरें निर्धारित की गई थीं। कोर्ट ने कहा कि वित्तीय संकट लाभ देने में देरी का कारण हो सकता है, लेकिन एक बार लाभ देने का निर्णय हो जाने पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।