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सुप्रीम कोर्ट का श्रम अधिकारों पर नया निर्णय: उद्योग की परिभाषा पर बहस

सुप्रीम कोर्ट ने श्रम अधिकारों और उद्योग की परिभाषा पर एक नई बेंच का गठन किया है, जो इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण निर्णय लेने जा रही है। केंद्र सरकार ने अदालत की दखलंदाजी का विरोध किया है, यह तर्क करते हुए कि सरकारी और समाज कल्याण से जुड़े कार्यों को औद्योगिक गतिविधि नहीं माना जाना चाहिए। इस मामले में श्रमिकों का दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उनके अधिकारों से जुड़ा है। जानें इस जटिल मुद्दे के बारे में और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की संभावित प्रभावों के बारे में।
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सुप्रीम कोर्ट का श्रम अधिकारों पर नया निर्णय: उद्योग की परिभाषा पर बहस

श्रम अधिकारों का मामला और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

यह तर्क किया जा सकता है कि श्रम अधिकारों का मुद्दा राजनीतिक क्षेत्र में आता है, जिसका निर्णय संसद या सरकार को करना चाहिए। हालांकि, जब यह मुद्दा संवैधानिक अधिकारों से जुड़ता है, तो अदालत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।


कौन सी गतिविधियों को “उद्योग” के रूप में मान्यता दी जाए, यह निर्णय अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथ में लिया है। लेकिन केंद्र सरकार इससे सहमत नहीं है। 1978 में, सर्वोच्च न्यायालय की एक सात सदस्यीय संविधान पीठ ने “उद्योग” की परिभाषा निर्धारित की थी। अब इस पर पुनर्विचार के लिए कोर्ट ने नौ जजों की बेंच का गठन किया है। केंद्र ने इस मामले में अदालत की दखलंदाजी का विरोध किया है। सरकार चाहती है कि सरकारी और समाज कल्याण से जुड़े कार्यों को “औद्योगिक गतिविधि” के रूप में नहीं माना जाए। यदि यह तर्क स्वीकार कर लिया जाता है, तो इन क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक श्रम कानूनों और संहिताओं के तहत मिलने वाले अधिकारों से वंचित हो जाएंगे।


यह स्पष्ट है कि इस मामले का श्रमिकों से भी गहरा संबंध है। इसलिए इस मामले में उनका दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण होगा। यह तर्क सही है कि श्रम अधिकारों से संबंधित पहलू राजनीतिक दायरे में आते हैं, जिनका निर्णय संसद या सरकार को करना चाहिए। लेकिन जब मामला संवैधानिक अधिकारों से जुड़ता है, तो अदालत की भूमिका अनिवार्य हो जाती है। इसी कारण 1978 में बैंगलोर जल आपूर्ति विभाग से संबंधित मामले में निर्णय लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट को संविधान पीठ का गठन करना पड़ा था। 2005 में उत्तर प्रदेश सरकार बनाम जयवीर सिंह मामले में यह विवाद फिर से उठ खड़ा हुआ, जो अब तक लंबित है।


इसी संदर्भ में अब कोर्ट ने नौ जजों की बेंच का गठन किया है। 1978 में कोर्ट ने कहा था कि किसी संगठन को “उद्योग” की श्रेणी में रखने के लिए यह देखना जरूरी नहीं है कि उसका उद्देश्य “मुनाफा” कमाना है या नहीं। इसके लिए कोर्ट ने तीन मानदंड निर्धारित किए: व्यवस्थित गतिविधि, प्रबंधन और श्रमिकों के बीच सहयोग, और वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन या वितरण। इस प्रकार, चैरिटी, सामाजिक कार्य और कल्याण कार्यों से जुड़े संगठन भी “उद्योग” की परिभाषा में आ गए। यह निर्णय उस समय आया जब श्रमिकों के हितों को प्राथमिकता दी जाती थी। आज का माहौल बदल चुका है, फिर भी श्रमिकों के हितों का ध्यान रखना आवश्यक है।