सुप्रीम कोर्ट की जमानत पर महत्वपूर्ण टिप्पणी, उमर खालिद का मामला
सुप्रीम कोर्ट की जमानत पर टिप्पणी
सोमवार को, सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच जिसमें जस्टिस उज्ज्वल भुइंया और जस्टिस बीवी नागरत्ना शामिल थे, ने जमानत के मुद्दे पर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। दोनों जजों ने स्पष्ट किया कि जमानत एक सामान्य प्रक्रिया है, जबकि जेल में रखना एक अपवाद है। उन्होंने यह भी बताया कि यह सिद्धांत गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के मामलों में भी लागू होता है। इसका मतलब यह है कि यूएपीए के तहत भी जमानत का अधिकार होना चाहिए और केवल विशेष परिस्थितियों में ही किसी को जेल में रखा जाना चाहिए।
इस संदर्भ में, उन्होंने जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद की जमानत खारिज होने का उल्लेख किया। जजों ने कहा कि जमानत खारिज करते समय, दो जजों की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी बेंच के निर्णय की अनदेखी की।
इसका तात्पर्य यह था कि उमर खालिद को भी जमानत मिलनी चाहिए। ध्यान देने योग्य है कि खालिद पिछले पांच वर्षों से जेल में हैं। जजों की टिप्पणियों से ऐसा प्रतीत होता है कि खालिद को जमानत मिलने की संभावना है। हालांकि, मंगलवार को एक अदालत ने उनकी अंतरिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया। खालिद ने अपनी मां की सर्जरी के लिए 15 दिन की जमानत मांगी थी, लेकिन अदालत ने इसे अस्वीकार कर दिया। यह स्थिति दर्शाती है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और निचली अदालत के फैसले के बीच एक बड़ा अंतर है, जो आजकल आम हो गया है।
