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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: हिंदू धर्म में आस्था का प्रमाण मंदिर नहीं, दीपक भी है

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है जिसमें कहा गया है कि हिंदू धर्म में आस्था को साबित करने के लिए मंदिर जाना आवश्यक नहीं है। केवल घर में एक दीपक जलाना भी आस्था का प्रतीक हो सकता है। यह टिप्पणी धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आई। जस्टिस नागरत्ना ने इसे जीवन जीने के तरीके के रूप में परिभाषित किया। जानें इस मामले में और क्या कहा गया।
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: हिंदू धर्म में आस्था का प्रमाण मंदिर नहीं, दीपक भी है

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हिंदू धर्म में आस्था को साबित करने के लिए मंदिर जाना अनिवार्य नहीं है। केवल घर में एक दीपक जलाना भी आस्था का प्रतीक हो सकता है। अदालत ने हिंदू धर्म को जीवन जीने का एक तरीका बताया।


महिलाओं के साथ भेदभाव पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई की गई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में नौ जजों की संविधान पीठ ने इस मामले पर विचार किया, जिसमें केरल के सबरीमाला मंदिर और दाऊदी बोहरा जैसे विभिन्न धर्मों की धार्मिक स्वतंत्रता पर चर्चा हुई।


सामाजिक न्याय की मांग

एक वकील, डॉ. जी. मोहन गोपाल ने अदालत में तर्क दिया कि धार्मिक समुदायों के भीतर से सामाजिक न्याय की मांग उठ रही है। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म को एक धार्मिक श्रेणी के रूप में परिभाषित किया गया है, लेकिन क्या हर व्यक्ति जो हिंदू के रूप में वर्गीकृत है, वेदों को सर्वोच्च मानता है?


जस्टिस नागरत्ना का बयान

हिंदू धर्म को जीवन जीने का तरीका बताया


जस्टिस नागरत्ना ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हिंदू धर्म को जीवन जीने का एक तरीका माना जाता है। मंदिर जाने या धार्मिक अनुष्ठान करने की आवश्यकता नहीं है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने घर में एक दीपक जलाता है, तो यह उसके धर्म को साबित करने के लिए पर्याप्त है।


संविधान पीठ की जानकारी

संविधान पीठ में शामिल जज


2018 में, एक पांच जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला अयप्पा मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को समाप्त कर दिया था। बुधवार को भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर 15वें दिन 9 जजों की संविधानिक पीठ ने सुनवाई की। इसमें जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।