सुप्रीम कोर्ट की तलाक मामले में पति-पत्नी के रिश्तों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाक के मामले में पति-पत्नी के संबंधों पर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए हैं। न्यायालय ने कहा कि पत्नी द्वारा खाना न बनाने या घरेलू कार्यों में लापरवाही को मानसिक क्रूरता का आधार नहीं माना जा सकता। जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने मौखिक रूप से यह स्पष्ट किया कि समय के साथ पति को भी घरेलू कार्यों में सहयोग देना चाहिए।
पति-पत्नी की जिम्मेदारियों पर चर्चा
जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि विवाह का अर्थ किसी नौकरानी से शादी करना नहीं है, बल्कि यह एक जीवनसाथी के साथ संबंध स्थापित करना है। जस्टिस विक्रम नाथ ने भी इस बात पर जोर दिया कि पति को खाना बनाने, कपड़े धोने और अन्य घरेलू कार्यों में मदद करनी चाहिए। अदालत ने कहा कि वर्तमान समय में पति-पत्नी दोनों को घर की जिम्मेदारियों को समान रूप से साझा करना चाहिए।
शादी और बच्चे का मामला
2017 में हुई थी शादी, 8 साल का बेटा
इस मामले में दंपति ने 2017 में विवाह किया और उनका एक 8 वर्षीय बेटा है। पति ने तलाक की याचिका में कहा कि शादी के एक सप्ताह बाद ही पत्नी का व्यवहार बदल गया। उसने आरोप लगाया कि पत्नी ने उसके और उसके माता-पिता के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया और खाना बनाने से मना कर दिया।
पत्नी के आरोप और दहेज का मामला
पत्नी ने लगाए दहेज के आरोप
पत्नी ने यह भी कहा कि वह बच्चे के जन्म के लिए अपने माता-पिता के घर गई थी, जहां पति और उसके परिवार ने पालना रस्म में भाग नहीं लिया। उसने आरोप लगाया कि ससुराल वालों ने उसके माता-पिता से नकद और सोने की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका को स्वीकार कर तलाक दे दिया था।
हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मामला
हाई कोर्ट ने पलटा फैसला, अब सुप्रीम कोर्ट में मामला
पत्नी ने हाई कोर्ट में अपील की, जहां तलाक का आदेश रद्द कर दिया गया। इस फैसले से असंतुष्ट पति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि दोनों पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेजा गया था, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं रहा। अब अगली सुनवाई में दोनों पक्षों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।
