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सुप्रीम कोर्ट की पॉक्सो कानून पर महत्वपूर्ण टिप्पणी: रोमियो जूलियट क्लॉज का समावेश

सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो कानून पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, जिसमें रोमियो जूलियट क्लॉज को जोड़ने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने कहा कि कई मामलों में इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है, जिससे सहमति से रिश्ते रखने वाले किशोरों को अपराधी बना दिया जाता है। यह निर्णय उत्तर प्रदेश से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें हाई कोर्ट ने एक नाबालिग से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी को जमानत दी थी। कोर्ट ने न्याय व्यवस्था पर जनता के भरोसे को बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
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सुप्रीम कोर्ट की पॉक्सो कानून पर महत्वपूर्ण टिप्पणी: रोमियो जूलियट क्लॉज का समावेश

सुप्रीम कोर्ट की नई टिप्पणी


नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए पॉक्सो कानून पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, जिसमें रोमियो जूलियट क्लॉज का उल्लेख किया गया है। अदालत ने यह माना कि कई मामलों में पॉक्सो कानून का गलत इस्तेमाल हो रहा है, जिससे सहमति से संबंध रखने वाले किशोरों को अपराधी बना दिया जाता है। इस समस्या को हल करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि पॉक्सो कानून में रोमियो जूलियट जैसी धारा जोड़ी जाए।


मामले की पृष्ठभूमि

यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक नाबालिग लड़की से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी को जमानत दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान हाई कोर्ट के कुछ निर्देशों को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत के स्तर पर पीड़ित की अनिवार्य मेडिकल उम्र की जांच का आदेश देना उचित नहीं है।


सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो कानून का मुख्य उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से बचाना है, लेकिन इसे उन मामलों में सख्ती से लागू करना गलत है, जहां दो किशोरों की उम्र में थोड़ा अंतर हो और उनका रिश्ता सहमति से हो। अदालत ने कहा कि रोमियो जूलियट क्लॉज का उद्देश्य ऐसे वास्तविक किशोर संबंधों को कानूनी कठोरता से बचाना है।


रोमियो जूलियट कानून की व्याख्या

क्या है रोमियो जूलियट कानून?


रोमियो जूलियट क्लॉज का तात्पर्य है कि यदि दो किशोर सहमति से रिश्ते में हैं और उनकी उम्र में मामूली अंतर है, जैसे 17 साल की लड़की और 18 साल का लड़का, तो अदालतें अधिक संवेदनशील और उदार दृष्टिकोण अपना सकती हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि उम्र में बड़ा अंतर हो या जबरदस्ती का मामला हो, तो कानून पूरी सख्ती से लागू होगा।


न्याय व्यवस्था पर भरोसा

न्याय व्यवस्था पर जनता के भरोसे को लेकर क्या कहा?


सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़ित की उम्र का निर्धारण मुकदमे का विषय है, न कि जमानत के चरण का। जमानत अदालत दस्तावेज देख सकती है, लेकिन उनकी सत्यता पर फैसला नहीं कर सकती। साथ ही, अदालत ने वकीलों की नैतिक जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा कि वे प्रतिशोधात्मक और तुच्छ मामलों के खिलाफ प्रहरी की भूमिका निभाएं, ताकि न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा बना रहे।