सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: वोटिंग का अधिकार भावनात्मक मुद्दा है
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में विशेष गणना (SIR) मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कड़ी टिप्पणी की है। न्यायालय ने कहा कि किसी व्यक्ति का जन्म जिस देश में हुआ है, वहां वोट देना केवल कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक मुद्दा भी है। कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से कहा कि हमें एक मजबूत अपीलीय मंच की आवश्यकता है, क्योंकि हम आगामी चुनावों की धूल और आक्रोश से अंधे नहीं हो सकते।
महिला की याचिका पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी कुरैशा यास्मिन नामक महिला की याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिनका नाम SIR प्रक्रिया के तहत वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था। कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को फटकार लगाते हुए कहा कि वोटिंग का अधिकार भावनाओं से जुड़ा है, इसलिए अपीलों को गंभीरता से सुनना आवश्यक है।
वोटिंग का अधिकार: भावनात्मक और कानूनी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस देश में आप पैदा हुए हैं, वहां वोट देना केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि एक भावनात्मक मुद्दा भी है। हमें एक मजबूत अपीलीय मंच की आवश्यकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' की समस्या केवल पश्चिम बंगाल में ही पाई गई है, अन्य राज्यों में नहीं।
निर्वाचन आयोग पर सवाल
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा कि 2002 के रोल में शामिल व्यक्तियों को कोई दस्तावेज प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन ECI बिहार में अपने पुराने रुख से भिन्न हो गया। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच विश्वास की कमी को देखते हुए न्यायिक अधिकारियों की मदद ली गई थी।
याचिकाकर्ता को अपीलीय ट्रिब्यूनल में जाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता कुरैशा यास्मिन को निर्देश दिया कि वे इस उद्देश्य के लिए बनाए गए अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपनी अपील दायर करें। कोर्ट ने कहा कि भावनात्मक मुद्दे होने के बावजूद कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।
