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सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी

सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता की 30 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देने वाले आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि नाबालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इस निर्णय में पीड़िता के अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी गई है। एम्स ने गर्भपात के खिलाफ दलीलें दीं, लेकिन अदालत ने पीड़िता के हितों को प्राथमिकता दी।
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सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय

नई दिल्ली - सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता की 30 सप्ताह की अनचाही गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति देने वाले अपने 24 अप्रैल के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। यह निर्णय मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची की पीठ ने सुनाया।


निर्णय का आधार

अदालत का तर्क
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह एक दुष्कर्म पीड़िता का मामला है, और ऐसे मामलों में नाबालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि मां को स्थायी शारीरिक विकलांगता का खतरा नहीं है, तो गर्भपात की अनुमति देना पीड़िता के सर्वोत्तम हित में है। अदालत ने यह भी माना कि ऐसी परिस्थितियों में पीड़िता को जीवनभर मानसिक आघात झेलना पड़ सकता है, जिसे ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है।


एम्स की चिंताएं

संस्थान की दलीलें
एम्स ने इस फैसले के खिलाफ उपचारात्मक याचिका दायर करते हुए तर्क दिया कि 30 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करना जोखिमभरा हो सकता है। संस्थान ने कहा कि इससे नाबालिग मां को दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं और भविष्य में मातृत्व पर भी असर पड़ सकता है।


अदालत का दृष्टिकोण

सुनवाई के दौरान
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत में कहा कि इस अवस्था में गर्भपात से जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह मामला भ्रूण और बच्ची के हितों के बीच संतुलन का है, लेकिन प्राथमिकता पीड़िता के अधिकारों और मानसिक स्थिति को दी जानी चाहिए।


काउंसलिंग के निर्देश

अदालत के आदेश
अदालत ने एम्स को निर्देश दिया कि वह पीड़िता और उसके माता-पिता की समुचित काउंसलिंग करे और यह सुनिश्चित करे कि अंतिम निर्णय स्वयं नाबालिग की इच्छा के अनुरूप हो।


महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी महिला, विशेषकर नाबालिग, को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था पूरी करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने इसे पीड़िता के अधिकारों और गरिमा से जुड़ा मामला बताया। यह फैसला ऐसे मामलों में न्यायपालिका के मानवीय दृष्टिकोण और पीड़ित-केंद्रित सोच को दर्शाता है, जहां कानून के साथ-साथ संवेदनशीलता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।