सुप्रीम कोर्ट ने 35 साल पुराने केस को किया खारिज, दो आरोपी हो चुके हैं मृत
केस की लंबी प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
अदालतों में मामलों की सुनवाई में देरी और कई वर्षों तक केस चलने की घटनाएं अक्सर देखने को मिलती हैं। कुछ मुकदमे तो 10 से 20 साल तक चलते रहते हैं। हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे ही मामले को समाप्त कर दिया, जिसमें 35 वर्षों में ट्रायल शुरू नहीं हो सका। यह जानकर आश्चर्य होता है कि इस केस के दो आरोपियों की मृत्यु हो चुकी है और दो अन्य को बरी कर दिया गया है। अब, पांचवे आरोपी के खिलाफ आरोपों को सुप्रीम कोर्ट ने देरी के कारण रद्द कर दिया है.
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस जे बी पारदीवाला और उज्जल भुइयां शामिल थे, ने कहा, 'हमें जानकारी मिली है कि कुल पांच आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। इनमें से दो आरोपियों का निधन हो चुका है और दो अन्य गवाहों की अनुपस्थिति के कारण बरी हो चुके हैं। इस केस की स्थिति को देखते हुए, हम इसे 35 साल की देरी के आधार पर खारिज कर रहे हैं।'
मुकदमे का विवरण
इस मामले में याचिकाकर्ता एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कैलाश चंद्र कापड़ी हैं। उन्होंने पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट में भी इस केस को खारिज करने की अपील की थी, लेकिन उनकी याचिका को स्वीकार नहीं किया गया। यह मामला 1989 में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के रामबाग जीआरपी थाने में दर्ज एक एफआईआर से संबंधित है। उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 323, 502 और रेलवे एक्ट की धारा 120 के तहत मुकदमा चलाया गया था.
राज्य सरकार का जवाब
इससे पहले, 22 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि निर्णय सुनाने से पहले उसे राज्य सरकार की राय लेनी होगी। उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने जवाब में बताया कि 2000 में राज्य के विभाजन के बाद से आरोपी उत्तराखंड में निवास कर रहे हैं और वे उत्तर प्रदेश की अदालत में पेश नहीं हो रहे हैं.
