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सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस को नई याचिकाएं दायर करने की दी अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को नई याचिकाएं दायर करने की अनुमति दी है। इस निर्णय के पीछे पश्चिम बंगाल में 31 सीटों पर जीत-हार के अंतर का मुद्दा है, जो मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से प्रभावित हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, 49 सीटों पर एसआईआर में काटे गए वोटों से कम अंतर के साथ परिणाम आए हैं। इस लेख में जानें कि यह निर्णय किस प्रकार राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित कर सकता है और क्या इससे चुनाव परिणामों में बदलाव संभव है।
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सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस को नई याचिकाएं दायर करने की दी अनुमति

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को नई याचिकाएं दायर करने की अनुमति प्रदान की है। पार्टी के सांसद और वकील कल्याण बनर्जी ने अदालत को सूचित किया कि पश्चिम बंगाल में 31 सीटें ऐसी हैं, जहां जीत और हार का अंतर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में काटे गए वोटों से कम है। इस संख्या को लेकर अभी भी कुछ भ्रम बना हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार, कुल 49 सीटों पर एसआईआर में काटे गए वोटों से कम अंतर के साथ परिणाम सामने आए हैं। इनमें से 26 सीटें भाजपा ने जीती हैं, 21 तृणमूल कांग्रेस के पास गई हैं और दो सीटें कांग्रेस को मिली हैं। हालांकि, सीटों की संख्या चाहे कितनी भी हो, सुप्रीम कोर्ट के मामले में निर्णय सैद्धांतिक मुद्दों पर ही होगा। इस पर सवाल उठता है कि क्या किसी सीट पर इस आधार पर परिणाम बदल सकता है या पुनः चुनाव कराए जा सकते हैं कि वहां जीत या हार का अंतर एसआईआर में काटे गए वोटों से कम है। अदालत को पहले इस पर निर्णय लेना होगा।


पिछले चुनावों का संदर्भ

यह ध्यान देने योग्य है कि इस तरह की स्थिति बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी उत्पन्न हुई थी। वहां कई उम्मीदवारों ने परिणामों को चुनौती देने का निर्णय लिया था, यह कहते हुए कि उनके सीट पर जितने वोट काटे गए हैं, उससे कम वोटों से वे हार गए हैं। ये सभी नेता राष्ट्रीय जनता दल या कांग्रेस से थे। लेकिन ऐसी कोई सूचना नहीं आई है कि बड़ी संख्या में हारे हुए उम्मीदवारों ने इस मुद्दे को चुनौती दी। इसका मुख्य कारण यह है कि ऐसे मामलों में निर्णय आने में काफी समय लग सकता है और कई बार चुनाव याचिकाओं का निपटारा होने से पहले ही विधानसभा या लोकसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाता है। इसके अलावा, एसआईआर में नाम कटने के आधार पर कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। कोई यह नहीं कह सकता कि जिन लोगों के नाम कटे हैं, वे सभी उसके वोटर थे।


मीडिया का नैरेटिव

हाल के दिनों में मीडिया के माध्यम से यह धारणा बनाई गई है कि पश्चिम बंगाल में जिन सीटों पर सबसे अधिक नाम कटे हैं, उनमें से चार पर तृणमूल कांग्रेस ने जीत हासिल की है और एक सीट कांग्रेस के खाते में गई है। हालांकि, इसका एक अलग विश्लेषण भी है। जिन सीटों पर सबसे अधिक नाम कटे हैं, वहां मुस्लिम आबादी 60 प्रतिशत से अधिक थी। इसलिए, नाम कटने के बावजूद तृणमूल या कांग्रेस का जीतना कोई असामान्य बात नहीं है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल में सुनवाई के दौरान कहा था कि यदि अंतर दो प्रतिशत है और 15 प्रतिशत नाम कटे हैं, तो अदालत इस पर विचार करेगी। यह एक सकारात्मक पहल है, लेकिन देखने से क्या स्पष्ट होगा? जो जीता है, वह भी तो यह दावा कर सकता है कि जो वोट उसे मिला है, वह उसका है और यदि वोट नहीं कटे होते, तो वह अधिक अंतर से जीतता।


विवाद का जटिलता

यह एक जटिल मामला है। जिन लोगों के नाम कटे हैं, यदि उनका अस्तित्व भी है, तो आप उन सभी को सामने खड़ा कर रायशुमारी नहीं कर सकते कि यदि उन्हें वोट देने का अवसर मिलता, तो वे किसे वोट देते। दूसरी ओर, यह धारणा बना दी गई है कि जहां सबसे अधिक नाम कटे हैं, वहां भी तृणमूल जीती है। इसका अर्थ है कि नाम कटने का परिणामों पर कोई प्रभाव नहीं है। यदि कोई प्रभाव है भी, तो कोई निश्चित रूप से नहीं बता सकता कि वह क्या है। यदि तृणमूल कांग्रेस कहेगी कि नाम कटने से उसे नुकसान हुआ, तो भाजपा भी यही तर्क प्रस्तुत करेगी। इसलिए, अदालत की कार्रवाई केवल अकादमिक चर्चा के लिए उपयुक्त है। इससे ममता बनर्जी को कोई विशेष लाभ नहीं होगा।