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सुप्रीम कोर्ट ने मेनका गांधी को चेतावनी दी, आवारा कुत्तों के मुद्दे पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी नेता मेनका गांधी को आवारा कुत्तों के प्रबंधन पर दिए गए बयानों के लिए चेतावनी दी है। अदालत ने उनके बयानों को अवमानना की श्रेणी में रखा, लेकिन कार्रवाई से परहेज किया। सुनवाई के दौरान, न्यायाधीशों ने कुत्तों के काटने की घटनाओं और जिम्मेदारी तय करने पर गंभीर सवाल उठाए। मेनका गांधी ने पहले भी इस मुद्दे पर सख्त कदमों का विरोध किया है। जानें इस मामले में और क्या हुआ।
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सुप्रीम कोर्ट ने मेनका गांधी को चेतावनी दी, आवारा कुत्तों के मुद्दे पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी


नई दिल्ली: आवारा कुत्तों के प्रबंधन से संबंधित टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को कड़ी चेतावनी दी है। अदालत ने उनके बयानों को अवमानना की श्रेणी में रखा, लेकिन न्यायिक उदारता का हवाला देते हुए कोई कार्रवाई नहीं की। इस दौरान, कोर्ट ने कुत्तों के काटने की घटनाओं, जिम्मेदारी तय करने और सरकारी नीतियों के कार्यान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए।


बजट और जिम्मेदारी पर उठाए गए सवाल

सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने मेनका गांधी के वकील से पूछा कि केंद्रीय मंत्री रहते हुए उन्होंने आवारा कुत्तों की समस्या के समाधान के लिए कितना बजट सुनिश्चित किया। कोर्ट ने कहा कि कुत्तों को खाना खिलाने वालों की जिम्मेदारी तय करने वाली टिप्पणी गंभीर चिंता का विषय है, न कि मजाक।


सीनियर वकील से तीखी बहस

मेनका गांधी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन से कोर्ट ने कड़े सवाल पूछे। पीठ ने कहा कि अदालत की टिप्पणियों पर संयम की बात करने से पहले अपने मुवक्किल के बयानों पर भी ध्यान देना चाहिए। कोर्ट ने उनके हावभाव और सार्वजनिक टिप्पणियों को लेकर नाराजगी व्यक्त की।


कसाब वाली टिप्पणी और प्रतिक्रिया

बहस के दौरान, राजू रामचंद्रन ने कहा कि उन्होंने आतंकी अजमल कसाब की भी पैरवी की है और बजट आवंटन नीति का विषय होता है। इस पर न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि कसाब ने अदालत की अवमानना नहीं की थी, लेकिन आपकी मुवक्किल ने की है। यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान चर्चा का विषय बनी।


आवारा कुत्तों के प्रति मेनका गांधी का पुराना रुख

मेनका गांधी पहले भी आवारा कुत्तों के खिलाफ सख्त कदमों का विरोध करती रही हैं। उनका मानना है कि समस्या कुत्तों की नहीं, बल्कि नगर निकायों की विफलता है। उन्होंने नसबंदी कार्यक्रमों के कागजी होने, कचरा प्रबंधन की असफलता और अस्पतालों से खुले में फेंके जा रहे कचरे को असली कारण बताया है। उनके अनुसार, खराब व्यवस्था से चमत्कार की उम्मीद करना समाधान नहीं है।