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सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर सुनवाई पूरी की

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला मंदिर में महिलाओं की एंट्री से संबंधित याचिका पर सुनवाई पूरी कर ली है। 9 जजों की बेंच ने 16 दिनों तक विभिन्न पक्षों की दलीलें सुनीं और अब अपना निर्णय सुरक्षित रखा है। इस मामले में धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक नैतिकता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की गई। केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया है, इसे धार्मिक आस्था का विषय बताया गया है।
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सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर सुनवाई पूरी की

महिलाओं की एंट्री पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित


सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने सुनवाई पूरी की


नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गुरुवार को सबरीमला मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से संबंधित भेदभाव की याचिका पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया। इस मामले में 16 दिनों तक केंद्र, धार्मिक संगठनों और याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनी गईं। सितंबर 2018 में, सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने महिलाओं के सबरीमला मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया था।


इसके बाद, 2019 में इस मुद्दे को बड़ी बेंच को भेजा गया। सुनवाई के दौरान 7 संवैधानिक सवालों पर चर्चा हुई। अब, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में 9 जजों की बेंच ने फैसला सुरक्षित रखा है। कोर्ट धार्मिक स्वतंत्रता, अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे, संवैधानिक नैतिकता और धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं पर निर्णय लेगी।


इसमें सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा मासिक धर्म की उम्र वाली 10 से 50 साल की महिलाओं का सबरीमला मंदिर में प्रवेश है। सुनवाई कर रही 9 जजों की बेंच में सीजेआई, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, आॅगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।


महिलाओं की एंट्री पर केंद्र सरकार का विरोध

केंद्र सरकार महिलाओं की एंट्री के खिलाफ है। सबरीमला मामले के साथ मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद और दरगाहों में प्रवेश और पारसी महिलाओं के अगियारी में प्रवेश से जुड़े मुद्दे भी बड़ी बेंच को भेजे गए थे। केंद्र ने अदालत में कहा कि सबरीमला मंदिर में मासिक धर्म आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध धार्मिक आस्था और संप्रदायिक स्वायत्तता का विषय है। केंद्र के अनुसार, यह मामला न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है।