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सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला विवाद में अंधविश्वास पर निर्णय का अधिकार स्वीकार किया

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला मंदिर विवाद पर सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया है कि उसे यह तय करने का अधिकार है कि किसी धर्म की कौन-सी प्रथा अंधविश्वास है। केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि धार्मिक मामलों में निर्णय लेना अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। सुनवाई में विभिन्न न्यायाधीशों ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए, जिसमें यह भी शामिल था कि क्या अदालत सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के आधार पर हस्तक्षेप कर सकती है। इस विवाद का इतिहास भी महत्वपूर्ण है, जिसमें 2018 में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को अवैध करार दिया गया था।
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सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला विवाद में अंधविश्वास पर निर्णय का अधिकार स्वीकार किया

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में महत्वपूर्ण बिंदु

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला विवाद पर चल रही सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया है कि उसे यह तय करने का अधिकार है कि किसी धर्म की कौन-सी प्रथा अंधविश्वास मानी जाएगी। इससे पहले, केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि धार्मिक मामलों में निर्णय लेना अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। सरकार ने यह भी कहा कि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ हैं, न कि धार्मिक मामलों के। कोर्ट ने यह भी कहा कि विधायिका द्वारा तय की गई बातें अंतिम नहीं हो सकतीं।


सुनवाई का विवरण

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला मंदिर से जुड़े मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में 9 न्यायाधीशों की संविधान बेंच द्वारा की जा रही है। यह बेंच केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित याचिकाओं पर विचार कर रही है। सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सवाल उठाया कि अदालत कैसे तय करेगी कि कोई प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत यह विधायिका का कार्य है।


सरकार के तर्क और न्यायालय की प्रतिक्रिया

तुषार मेहता ने कहा कि संसद या राज्य विधानसभाएं किसी प्रथा को अंधविश्वास मानकर उसके खिलाफ कानून बना सकती हैं, जैसे कि काला जादू रोकने के लिए। इस पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला ने कहा कि अदालत के पास यह तय करने का अधिकार है कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि विधायिका के निर्णय को अंतिम नहीं माना जा सकता।


धर्मनिरपेक्षता और अंधविश्वास

तुषार मेहता ने यह भी कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत किसी धार्मिक प्रथा को अंधविश्वास नहीं कह सकती क्योंकि उसके पास धार्मिक मामलों में विशेषज्ञता नहीं होती। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि यदि जादू-टोना किसी धर्म का हिस्सा है, तो क्या उसे अंधविश्वास नहीं माना जाएगा? उन्होंने यह भी पूछा कि यदि विधायिका चुप है, तो क्या अदालत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती?


धर्म के सिद्धांतों पर निर्णय

तुषार मेहता ने कहा कि अदालत समीक्षा कर सकती है, लेकिन यह अंधविश्वास के आधार पर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर होनी चाहिए। न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि किसी धार्मिक प्रथा को समझने के लिए उसी धर्म के दृष्टिकोण से देखना चाहिए।


पृष्ठभूमि

सबरीमला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश को लेकर विवाद पर सुनवाई जारी है। सितंबर 2018 में, पांच जजों की संविधान बेंच ने 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को अवैध और असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद, 14 नवंबर 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में एक दूसरी बेंच ने इस मुद्दे को बड़ी बेंच को भेज दिया।