सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों पर सुनवाई: कपिल सिब्बल की दलीलें हुईं खारिज
सुप्रीम कोर्ट की गंभीरता
भारत में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और इससे उत्पन्न समस्याओं पर सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से ध्यान केंद्रित किया है। बुधवार को इस मुद्दे पर सुनवाई के दौरान, अदालत ने वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की दलीलों पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। कोर्ट ने उनके एक बयान को वास्तविकता से भिन्न बताते हुए उन्हें फटकार लगाई।
सिब्बल की दलीलें और कोर्ट की प्रतिक्रिया
सुनवाई के दौरान, कपिल सिब्बल ने कहा कि आवारा कुत्ते सड़कों पर नहीं, बल्कि परिसरों में पाए जाते हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत आपत्ति जताई, यह कहते हुए कि यह बयान वास्तविकता से मेल नहीं खाता। जजों ने यह भी पूछा कि क्या यह दावा सच है, क्योंकि रोजमर्रा की जिंदगी में सड़कों पर कुत्तों की उपस्थिति स्पष्ट है।
सिर्फ काटने का मुद्दा नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल कुत्तों के काटने तक सीमित नहीं है। अदालत ने कहा कि आवारा कुत्ते अक्सर राहगीरों और वाहनों का पीछा करते हैं, जिससे सड़क पर दुर्घटनाएं होती हैं। जब सिब्बल ने कहा कि कुत्ते मुख्य रूप से परिसरों में रहते हैं, तो कोर्ट ने सख्त लहजे में पूछा कि क्या वह इस बात को गंभीरता से ले रहे हैं।
कुत्तों की आवश्यकता पर सवाल
बेंच ने यह सवाल उठाया कि आखिर हमें सड़कों, स्कूलों और संस्थानों में कुत्तों की आवश्यकता क्यों है। इस पर सिब्बल ने कहा कि यदि कोई कुत्ता आक्रामक हो जाता है, तो उसे पकड़कर नसबंदी की जाती है और फिर उसी क्षेत्र में छोड़ दिया जाता है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने व्यंग्य करते हुए कहा कि अब तो बस कुत्तों को काउंसलिंग देने की आवश्यकता रह गई है, ताकि वे वापस छोड़े जाने के बाद किसी को नुकसान न पहुंचाएं। हालांकि, सिब्बल ने इसे मजाक में कहा, लेकिन अदालत ने इसे गंभीरता से लिया।
उदाहरण के माध्यम से सफाई
कपिल सिब्बल ने अपनी बात को समर्थन देने के लिए एक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए CSVR मॉडल अपनाया गया है, जिससे स्थिति में सुधार हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि कोई बाघ आदमखोर हो जाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि सभी बाघों को मार दिया जाए। इसी तरह, सभी कुत्तों को दोषी मानना उचित नहीं है।
