सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के अधिकारों पर महत्वपूर्ण बहस
महिलाओं के प्रति भेदभाव पर न्यायालय की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने हाल ही में कहा कि किसी महिला को महीने में तीन दिन 'अछूत' मानना और चौथे दिन सामान्य मान लेना पूरी तरह से अनुचित है। यह टिप्पणी उन्होंने धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की।
यह मामला केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर से संबंधित है, जहां 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, 'महिला होने के नाते मैं यह पूछती हूं कि हर महीने तीन दिन अछूत माना जाना और चौथे दिन सामान्य हो जाना, यह कैसे संभव है?'
संविधानिक बेंच में एकमात्र महिला जज
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना इस 9 जजों की संवैधानिक बेंच की एकमात्र महिला सदस्य हैं, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस सूर्य कांत कर रहे हैं। इस मामले में धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों पर गहन चर्चा हो रही है।
आर्टिकल 17 पर सवाल
जस्टिस नागरत्ना ने सबरीमाला मामले में आर्टिकल 17 (जो छुआछूत को समाप्त करता है) के उपयोग पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि आर्टिकल 17 को अस्पृश्यता की पुरानी परंपरा को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था।
सॉलिसिटर जनरल का विरोध
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के सबरीमाला फैसले पर आपत्ति जताई। उस फैसले में जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा था कि 10-50 साल की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना 'अछूत' जैसा व्यवहार है, जो संविधान के आर्टिकल 17 का उल्लंघन है। उन्होंने इसे पितृसत्ता को बढ़ावा देने वाला और महिलाओं की गरिमा के खिलाफ बताया था।
तुषार मेहता ने कहा, 'भारत पितृसत्तात्मक या जेंडर स्टीरियोटाइप नहीं है जैसा पश्चिम समझता है। सबरीमाला में महिलाओं पर रोक मासिक धर्म से नहीं, बल्कि उम्र समूह (10-50 साल) से संबंधित है।' उन्होंने यह भी कहा कि पूरे देश और दुनिया के अयप्पा मंदिरों में सभी उम्र की महिलाएं जा सकती हैं, केवल यह एक विशेष मंदिर है।
महिलाओं के प्रवेश पर विवाद
सबरीमाला मंदिर में लॉर्ड अयप्पा की पूजा के लिए 10-50 साल की महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया जाता। याचिकाकर्ता इसे महिलाओं के साथ भेदभाव मानते हैं, जबकि मंदिर प्रशासन इसे धार्मिक परंपरा के रूप में देखता है।
