Newzfatafatlogo

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला विवाद: केंद्र सरकार का धार्मिक प्रथाओं पर जोरदार समर्थन

केंद्र सरकार ने सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन किया है। सरकार का कहना है कि यह मामला केवल लैंगिक समानता से नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और परंपरा से भी जुड़ा है। केंद्र ने अदालतों से धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा न करने का आग्रह किया है, और कहा है कि किसी प्रथा की अनिवार्यता तय करने का अधिकार संबंधित धार्मिक संप्रदाय के पास होना चाहिए। जानें इस विवाद के विभिन्न पहलुओं और केंद्र के तर्कों के बारे में।
 | 
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला विवाद: केंद्र सरकार का धार्मिक प्रथाओं पर जोरदार समर्थन

केंद्र का समर्थन और सुप्रीम कोर्ट में दलीलें


केंद्र सरकार ने 2018 में सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने वाले सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन किया है। आज की सुनवाई से पहले, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत लिखित दलीलें प्रस्तुत की हैं, जिसमें कहा गया है कि यह मामला केवल लैंगिक समानता से नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, परंपरा और संप्रदायिक स्वायत्तता से भी जुड़ा हुआ है।


धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा पर केंद्र का रुख

केंद्र सरकार ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से हलफनामा दाखिल करते हुए स्पष्ट किया कि धार्मिक प्रथाओं को तर्कसंगतता या आधुनिकता के पैमाने पर परखना न्यायिक अतिक्रमण होगा। सरकार ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि अदालतों को धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा नहीं करनी चाहिए।


धर्म की व्याख्या का अधिकार

केंद्र ने यह भी कहा कि यदि अदालतें धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा तर्कसंगतता या आधुनिकता के मानकों पर करेंगी, तो वे अपने विचारों को धर्म पर थोप रही होंगी, जो संविधान के अनुरूप नहीं है। सरकार ने जोर देकर कहा कि धार्मिक प्रथाओं की अनिवार्यता तय करने का अधिकार अदालतों के बजाय संबंधित धार्मिक संप्रदाय के पास होना चाहिए।


अयप्पा स्वरूप और महिलाओं का प्रवेश

केंद्र ने बताया कि सबरीमला में भगवान अयप्पा की पूजा 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' के रूप में होती है। महिलाओं, विशेषकर प्रजनन आयु वर्ग के प्रवेश पर प्रतिबंध इसी धार्मिक स्वरूप से जुड़ा है। सरकार ने इसे भेदभाव नहीं, बल्कि धार्मिक परंपरा का हिस्सा बताया।


2018 के फैसले पर सवाल

केंद्र ने 2018 में पांच जजों की पीठ के फैसले की आलोचना की, जिसमें भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य स्वरूप की जांच की गई थी। सरकार ने 'संवैधानिक नैतिकता' की अवधारणा को अस्पष्ट बताया और कहा कि इसका संविधान में कोई स्पष्ट आधार नहीं है।


जोसेफ शाइन फैसले पर आपत्ति

केंद्र ने जोसेफ शाइन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) फैसले पर भी सवाल उठाया है, जिसमें व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया था। सरकार ने अदालत से आग्रह किया है कि इस फैसले को 'Bad in Law' घोषित किया जाए।


संविधान और न्यायिक फैसले

केंद्र ने चेतावनी दी कि संवैधानिक फैसले संविधान, पूर्व निर्णयों और स्थापित कानूनी सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए। जजों के व्यक्तिगत विचारों को न्यायिक फैसलों का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। सबरीमला विवाद अब धार्मिक स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा की सीमा, आवश्यक धार्मिक प्रथा और संवैधानिक नैतिकता जैसे मुद्दों पर व्यापक बहस का विषय बन चुका है।