सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर कानूनी बहस शुरू
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का आगाज़
नई दिल्ली: सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा और आस्था का एक महत्वपूर्ण मुद्दा एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत में पहुंच गया है। केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को एक नई कानूनी लड़ाई शुरू हुई है। सुनवाई के पहले दिन ही केंद्र सरकार ने अपना स्पष्ट रुख पेश किया, जिसमें कहा गया कि मासिक धर्म की आयु वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए।
केंद्र सरकार का स्पष्ट विरोध
‘भगवान अय्यप्पा की ब्रह्मचारी परंपरा’: सबरीमाला विवाद पर दायर पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई के दौरान केंद्र ने महिलाओं के प्रवेश का कड़ा विरोध किया। सरकार ने अदालत में अपनी दलील में कहा कि भगवान अय्यप्पा नित्य ब्रह्मचारी हैं और उनके अनुयायियों का एक विशिष्ट संप्रदाय है, जिसके अपने सख्त नियम और परंपराएं हैं। केंद्र का तर्क है कि अदालतें धार्मिक आस्था और विश्वास पर निर्णय देने का अधिकार नहीं रखतीं।
2018 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग
महिलाओं के लिए मंदिर के दरवाजे खोलने का मामला: इस महत्वपूर्ण सुनवाई में केंद्र ने 2018 में दिए गए उस ऐतिहासिक फैसले पर पुनर्विचार करने का समर्थन किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं के लिए मंदिर के दरवाजे खोलने का आदेश दिया था। सरकार ने कहा कि यह मामला केवल लैंगिक समानता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा और आस्था से जुड़ा है। अदालतों को धार्मिक प्रथाओं की नई व्याख्या करने से बचना चाहिए।
धार्मिक मामलों में अदालत की भूमिका
संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की समीक्षा: मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली 9 जजों की बेंच इस बात की समीक्षा कर रही है कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत 'आवश्यक धार्मिक प्रथाओं' के सिद्धांत क्या हैं। केंद्र ने अदालत को सुझाव दिया है कि न्यायिक समीक्षा के दौरान संवैधानिक सिद्धांतों का सम्मान किया जाना चाहिए और धार्मिक मानदंडों को संबंधित समुदाय के विवेक पर छोड़ देना चाहिए।
