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सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सुनवाई शुरू

सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर सुनवाई शुरू की। केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर अपनी दलीलें पेश कीं, जिसमें उन्होंने 2018 के फैसले को गलत बताया। जस्टिस नागरत्ना ने भी महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं। यह मामला केरल विधानसभा चुनाव से पहले उठाया गया है, जिससे इसकी राजनीतिक महत्ता बढ़ गई है। सुनवाई 22 अप्रैल तक जारी रहेगी, जिसमें लगभग 50 याचिकाओं पर विचार किया जाएगा।
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सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सुनवाई शुरू

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का प्रारंभ

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान बेंच ने मंगलवार को केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर सुनवाई आरंभ की। यह मामला पहले भी सर्वोच्च अदालत में उठ चुका है, लेकिन केंद्र सरकार और अन्य समूह इस निर्णय से संतुष्ट नहीं हैं। इस बार बड़ी बेंच इस पर विचार कर रही है। सुनवाई का समय भी खास है, क्योंकि दो दिन बाद गुरुवार को केरल में चुनाव होने वाले हैं, जिसके लिए प्रचार मंगलवार को समाप्त हो गया।


केंद्र सरकार का रुख

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा कि हर उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति देना उचित नहीं है। पहले दिन की सुनवाई में, केंद्र ने सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म की उम्र वाली महिलाओं के प्रवेश पर रोक का समर्थन किया। यह मुद्दा केरल विधानसभा चुनाव में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। मंगलवार को संविधान बेंच ने पांच घंटे तक सुनवाई की।


सरकार की दलीलें

केंद्र ने कहा, '2018 में सभी वर्ग की महिलाओं को प्रवेश देने का सुप्रीम कोर्ट का निर्णय गलत था। यह मामला धार्मिक आस्था और संप्रदाय के अधिकार से संबंधित है।' सरकार ने यह भी कहा कि अदालतें महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश के मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं। यदि कोई प्रथा गैर-वैज्ञानिक लगती है, तो उसका समाधान संसद या विधानसभा के पास है, न कि अदालत के पास।


जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी

केंद्र सरकार की इस दलील पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा, 'अनुच्छेद 17 के तहत छुआछूत के खिलाफ अधिकार पर दलील कैसे दी जाए, यह मेरी समझ से परे है। एक महिला होने के नाते, मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने तीन दिन तक महिला को अछूत माना जाए और चौथे दिन अचानक वह अछूत न रह जाए।' इससे पहले, केंद्र की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 2018 के फैसले में कहा गया था कि 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना अनुच्छेद 17 के तहत अछूत प्रथा के समान है।


धार्मिक प्रथाओं का सम्मान

केंद्र सरकार ने कहा, 'हर धार्मिक समूह की प्रथाओं का सम्मान किया जाना चाहिए और हर चीज को गरिमा या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से नहीं जोड़ा जा सकता।' उदाहरण के लिए, यदि किसी मजार या गुरुद्वारे में सिर ढकना अनिवार्य है, तो इसे अधिकारों का हनन नहीं माना जा सकता। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा, 'यदि कोई सामाजिक बुराई है, जिसे धार्मिक प्रथा का नाम दिया गया है, तो अदालत उनके बीच भेद कर सकती है कि वह एक सामाजिक बुराई है या अनिवार्य धार्मिक प्रथा है।' सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई 22 अप्रैल तक जारी रहेगी, जिसमें लगभग 50 याचिकाओं पर विचार किया जाएगा।