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हल्दी की नई किस्म 'प्रगति' से किसानों को मिलेगी राहत

भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान ने हल्दी की एक नई किस्म 'प्रगति' विकसित की है, जो कम पानी और पाले को सहन कर सकती है। यह किस्म केवल 180 दिनों में तैयार होती है, जिससे किसानों को जल्दी फसल काटने का अवसर मिलता है। इसके उच्च करक्यूमिन स्तर के कारण इसकी मांग बढ़ने की संभावना है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिल सकता है। जानें इस नई किस्म के फायदों और खेती की तकनीकों के बारे में।
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हल्दी की नई किस्म 'प्रगति' से किसानों को मिलेगी राहत

हल्दी की नई किस्म का विकास

चंडीगढ़, 10 मई। भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान (ICAR), कोझीकोड के वैज्ञानिकों ने हल्दी की एक नई उन्नत किस्म विकसित की है, जिसका नाम 'प्रगति' रखा गया है। यह किस्म कम पानी और पाले को सहन करने में सक्षम है, साथ ही यह कम समय में अधिक उपज देने का दावा करती है। जलवायु परिवर्तन और अनियमित बारिश से प्रभावित किसानों के लिए यह किस्म एक महत्वपूर्ण समाधान साबित हो सकती है।


बाजार में बढ़ती मांग और निर्यात के अवसर

हल्दी की गुणवत्ता उसकी करक्यूमिन मात्रा से निर्धारित होती है। 'प्रगति' में करक्यूमिन का स्तर 5.55 प्रतिशत है, जो सामान्य किस्मों की तुलना में काफी बेहतर है। इसमें 13 प्रतिशत तक ओलियोरेसिन भी पाया गया है, जो इसे खाद्य प्रसंस्करण और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात के लिए उपयुक्त बनाता है। दवा कंपनियां उच्च करक्यूमिन वाली हल्दी के लिए किसानों को बेहतर मूल्य देती हैं।


सिर्फ 6 महीने में फसल की तैयारी

आमतौर पर हल्दी की फसल को पकने में 8 से 10 महीने लगते हैं, लेकिन 'प्रगति' किस्म केवल 180 दिनों में तैयार हो जाती है। इससे किसानों को जल्दी फसल काटने का अवसर मिलता है, जिससे वे दूसरी फसल की योजना बना सकते हैं। यह किस्म नेमाटोड जैसे हानिकारक कीटों के प्रति भी प्रतिरोधी है।


बुवाई की वैज्ञानिक तकनीक

बेहतर उत्पादन के लिए खेत की तैयारी के समय प्रति हेक्टेयर 200-250 क्विंटल सड़ी हुई गोबर की खाद डालना आवश्यक है। बुवाई के दौरान 120 किलो नाइट्रोजन और 80-80 किलो फास्फोरस व पोटाश का मिश्रण मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाता है। पौधों के बीच 40×20 सेमी की दूरी रखनी चाहिए और हल्दी के 20-25 ग्राम के प्रकंद को 4 सेमी की गहराई में लगाना चाहिए। बीज को कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के घोल से उपचारित करना अनिवार्य है।


बागवानी के साथ हल्दी की खेती

प्रगति किस्म की खेती के लिए खाली खेत होना जरूरी नहीं है। किसान अपने पुराने आम या अमरूद के बागों में भी इसकी बुवाई कर सकते हैं। इसे इंटर-क्रॉप के रूप में विकसित किया गया है। मेड़ बनाकर बुवाई करने से जल निकासी बेहतर होती है और हल्दी की गांठों का आकार भी बड़ा होता है। यह मॉडल कम जमीन वाले किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक प्रभावी तरीका है।