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हिंदू-कुश हिमालय में बर्फबारी में गिरावट: जलवायु परिवर्तन का गंभीर संकेत

जलवायु परिवर्तन अब एक वास्तविकता बन चुका है, और हिंदू-कुश हिमालय में बर्फबारी में गिरावट इस बात का स्पष्ट संकेत है। हाल ही में जारी सैटेलाइट आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में पिछले 23 वर्षों में सबसे कम बर्फबारी दर्ज की गई है। IPCC की चेतावनियों के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण बर्फबारी का मौसम छोटा होता जा रहा है, जिससे जल संकट, बाढ़ और सूखे जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। जानें इस गंभीर स्थिति के बारे में और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
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हिंदू-कुश हिमालय में बर्फबारी में गिरावट: जलवायु परिवर्तन का गंभीर संकेत

जलवायु परिवर्तन की वास्तविकता

नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन अब केवल भविष्य की चिंता नहीं रह गई है, बल्कि यह वर्तमान की एक कड़वी सच्चाई बन चुका है। धरती के तापमान में वृद्धि का प्रभाव मौसम के पैटर्न पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। सर्दियों की देरी, पहाड़ों पर बर्फ का तेजी से पिघलना और समुद्र के स्तर में वृद्धि, सभी आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के संकेत दे रहे हैं। हाल ही में हिंदू-कुश हिमालय से प्राप्त आंकड़े जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को एक बार फिर उजागर करते हैं।


बर्फबारी में ऐतिहासिक गिरावट

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) द्वारा जारी किए गए सैटेलाइट डेटा के अनुसार, हिंदू-कुश हिमालय क्षेत्र में इस वर्ष पिछले 20 वर्षों में सबसे कम बर्फबारी दर्ज की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 23 वर्षों में यह सबसे कमजोर स्नो सीजन रहा है, जो क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।


IPCC की चेतावनी

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) पहले ही बढ़ते वैश्विक तापमान के बारे में चेतावनी जारी कर चुका है। IPCC के अनुसार, तापमान में निरंतर वृद्धि के कारण बर्फबारी का मौसम छोटा होता जा रहा है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ गिरने की अवधि कम होती जा रही है, जिससे हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां धीरे-धीरे पथरीली दिखाई देने लगेंगी।


जल संकट का खतरा

हिंदू-कुश हिमालय को एशिया का ‘वॉटर टावर’ माना जाता है, क्योंकि यहीं से कई प्रमुख नदियों का उद्गम होता है। ये नदियां करोड़ों लोगों के लिए जीवनरेखा हैं और मैदानी क्षेत्रों की कृषि और हरियाली इन्हीं पर निर्भर करती है। ऐसे में बर्फबारी में कमी और तेजी से पिघलते ग्लेशियर भविष्य में जल संकट, बाढ़ और सूखे जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकते हैं।